द फॉलोअप डेस्क
व्यंकटेश पांडेय/ पटना
अपनी योजनाओं और किए गए विकास से राजनीतिक पार्टियां पता नहीं कितने लोगों तक पहुंचने में सफल रहती हैं, लेकिन हां काम से ज्यादा चुनाव प्रचार के जरिए मतदाताओं को रिझाने की कोशिश खूब की जाती है, शायद इसीलिए काम पर कम और प्रचार पर ज्यादा ध्यान रहता है।
बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले AI एक्टिव हो गया है, और ये पहला चुनाव होगा जिसमें इस तरह से AI का सहारा लिया जा रहा है। बात तकनीक की आई है, तो थोड़ा इतिहास में लौटते हैं, देश का पहला चुनाव (साल 1951-52) जब सियासी दलों के पास न तो ज्यादा पैसा था और ना बहुत संसाधन, लिहाजा कांग्रेस को लेकर सभी सियासी दल बहुत सीमित तरीके से अपना प्रचार कर रहे थे। लेकिन हां उस समय भी एक ऐसा दल था, जिसका प्रचार रेडियो से हो रहा था, जो कि उस समय के लिए बहुत बड़ी बात थी। लेकिन बात तो केवल इतनी भर नहीं थी, क्योंकि ये प्रचार कोई All india Radio से नहीं बल्कि मास्को रेडियो से हो रहा था। आपके दिलोदिमाग में सवाल आ रहा होगा आखिर वो कौन सी पार्टी थी, शायद जवाब भी आ रहा होगा कांग्रेस? खैर सस्पेंस पर पूर्ण विराम लगाता हूं और बता देता हूं। ये थी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, इसके पीछे की भी एक अलग कहानी है, जो फिर कभी...

2025 बिहार के लिए चुनावी साल है और इस साल के आखिर में यहां चुनाव होने हैं, जिसे लेकर अभी से सियासी पारा हाई है और राजनीतिक दल हर तरह से लोगों के जहन में पहुंचने की निरंतर कोशिश कर रहे हैं।
मौजूदा वक्त में प्रत्येक हाथ में रोजगार हो न हो मोबाइल तो जरूर है, यही वजह है कि सभी पार्टियां सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हैं। खास कर के RJD तो कमोबेश रोज ही AI से बना कर एक वीडियो पोस्ट कर ही देती है और मौजूदा सरकार पर निशाना साधती है। मसलन आज ही तेजस्वी यादव ने एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें कैप्शन लिखा था "ना रोजगार के लिए ना बिहार के लिए वो चिंता करते है अपने प्यारे दामाद के लिए।" वैसे ही BJP भी अपने पोस्ट के जरिए लगातार RJD काँग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों को घेरने की कोशिश कर रही है।
1950 से लेकर अब तक दुनिया में जहां तकनीक ने समाज की सोच के साथ दिशा बदली है, वहीं चुनाव प्रचार की रणनीतियां भी पूरी तरह बदल गई हैं। आजादी के शुरुआती दौर में चुनाव प्रचार का जोर व्यक्ति की छवि, हाथ से लिखे पोस्टर, साइकिल से गांव-गांव जाकर भाषण देने तक ही सीमित था। लेकिन जैसे-जैसे टेलीविजन आया, प्रचार को नया माध्यम मिल गया। फिर 1990 के बाद जैसे-जैसे निजी चैनल, मोबाइल और इंटरनेट का प्रसार हुआ, प्रचार डिजिटल होता गया। अब तो सोशल मीडिया का युग है, जहां ट्वीट, फेसबुक पोस्ट और वायरल वीडियो चुनावी जीत-हार तय करने लगे हैं।
अब प्रचार सिर्फ जनसंपर्क नहीं बल्कि डेटा, एल्गोरिदम और माइक्रो-टार्गेटिंग का खेल है। नतीजा ये है कि अब चुनाव प्रचार ज्यादा तेज, आक्रामक और रणनीतिक हो चुका है।