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बिहार : डॉक्टर बनने का सपना, हॉस्टल में मौत और सवालों के घेरे में पुलिस की भूमिका

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शाश्वत/ पटना 
यह कहानी पटना पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है, लेकिन इसके केंद्र में है जहानाबाद की एक बेटी, जिसका सपना डॉक्टर बनने का था। परिवार के सहयोग से वह नीट की तैयारी के लिए पटना आई, एक प्रतिष्ठित कोचिंग में दाखिला लिया और चित्रगुप्त नगर स्थित शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहने लगी।
क्रिसमस की छुट्टियों के चलते 26 दिसंबर को वह घर लौटी और नए साल के बाद 5 जनवरी की रात ट्रेन से पटना पहुंचकर हॉस्टल वापस आई। परिजनों और दोस्तों से बातचीत के बाद उसने खाना खाया और सो गई। इसके बाद 6 जनवरी की सुबह वह हॉस्टल के सामान्य रूटीन में नजर नहीं आई।
दोपहर तक कमरे से बाहर न आने पर हॉस्टल स्टाफ ने दरवाजा खोला, जहां छात्रा बेहोश हालत में पड़ी मिली। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, फिर एक के बाद एक अस्पताल बदले गए। 6 जनवरी को ही पुलिस को सूचना दी गई थी, क्योंकि शरीर पर चोट के निशान थे, लेकिन आरोप है कि चित्रगुप्त नगर थाना की पुलिस तीन दिन तक अस्पताल पहुंची ही नहीं।


तीन दिन की चुप्पी, 9 जनवरी को एफआईआर
9 जनवरी को जब छात्रा की हालत गंभीर हो गई और उसे बड़े अस्पताल में रेफर किया गया, तब परिजनों ने जबरदस्ती और मारपीट की आशंका जताते हुए एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। आरोप है कि तीन दिन की देरी के बाद थाने में केस दर्ज हुआ, लेकिन इसके बाद भी ठोस जांच शुरू नहीं हुई।
परिजनों का आरोप है कि पुलिस की ओर से संवेदनहीन रवैया अपनाया गया और शुरुआती जांच एक निजी ड्राइवर के भरोसे छोड़ दी गई। इसी बीच छात्रा को मेदांता अस्पताल रेफर किया गया, जहां 11 जनवरी को उसकी मौत हो गई।
पुलिस का दावा और पोस्टमार्टम का पलटवार
12 जनवरी को पुलिस अधिकारियों ने मीडिया के सामने दावा किया कि यह आत्महत्या का प्रयास था, कमरे से स्लीपिंग पिल्स मिलीं और यौन उत्पीड़न के कोई संकेत नहीं हैं। लेकिन 14 जनवरी को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इस दावे को कठघरे में खड़ा कर दिया।
रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की संभावना से इनकार नहीं किया गया, प्राइवेट पार्ट्स और शरीर पर कई चोटों और खरोंच के निशान पाए गए। इसके बाद पुलिस की शुरुआती थ्योरी और प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल उठने लगे।


SIT बनी, लेकिन निष्पक्षता पर संदेह
मामले में अब एसआईटी का गठन किया गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उसी टीम में वे अधिकारी भी शामिल हैं, जिनकी भूमिका पर पहले ही सवाल खड़े हो चुके हैं। परिजन पूछ रहे हैं कि क्या ऐसे में निष्पक्ष जांच संभव है।
अब भी कई सवाल अनुत्तरित हैं, हॉस्टल संचालिका और केयरटेकर कहां हैं, शुरुआती मेडिकल बयान देने वाले डॉक्टर पर कार्रवाई कब होगी, क्राइम सीन सुरक्षित क्यों नहीं रखा गया और 5–6 जनवरी की रात आखिर क्या हुआ? परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है। मां का कहना है कि पुलिस दोषियों को ढूंढने के बजाय उन्हें ही शक के दायरे में रख रही है। पिता इसे हत्या और पॉक्सो एक्ट का मामला बता रहे हैं। फिलहाल जांच जारी है और डीएनए रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, लेकिन सवाल वही है—सच्चाई कब सामने आएगी और डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली उस बेटी को कब इंसाफ मिलेगा?


 

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