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16 जनवरी, शहादत दिवस पर विषेष : जन हस्तक्षेप के जीवंत प्रतीक कॉमरेड महेंद्र सिंह!

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अनिल अंशुमन
वर्षों पूर्व एक विश्व राजनेता ने कहा था- सपने देखना चाहिए!
बाद के समय एक राजनेता अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से कहते हैं,
डूबती आंखों और/टूटती सांसों के अंदर भी/ज़िंदा हैं सपने…!
यूं तो दोनों ही में ‘सपने’ पर ज़ोर दिया गया है, लेकिन दोनों में थोड़ा अंतर (विरोध नहीं) साफ़ तौर से महसूस किया जा सकता है। क्योंकि जिन विपरीत स्थितियों में आज हर कोई जीने को विवश बनाया जा चुका है कि वह “आदमी को निर्णायक होना चाहिए” पर सोच भी नहीं पा रहा है। ऐसे में कोई दोस्ताना लहजे में यह आत्मविश्वास दिला रहा है कि उसके “सपने” मरे नहीं हैं। इसलिए तमाम निराशाओं के बीच उसे “उम्मीद” का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।
‘उम्मीद’ का आत्मविश्वास जगाने वाले राजनेता हैं महेंद्र सिंह!


बीस बरस पहले, 16 जनवरी के दिन, जब अपनी अत्याधुनिक बंदूक के निशाने पर लेकर हत्यारों ने धमकाकर पूछा, महेंद्र सिंह कौन है? उस संगीन हालात में बेख़ौफ़ आवाज़ गूंजती है, मैं हूं महेंद्र सिंह! फिर तो क्षणभर में गोली चल जाती है, चुप करने को जनता की उस बुलंद आवाज़ को, जिससे जीते-जी पार पाना असंभव सा हो गया था ज़ोर-ज़ुल्म और लूट-झूठ का राज चलाने वाली ताक़तों के लिए।
शिद्दत के साथ गौरतलब है कि शहादत के आज बीस साल बाद भी लोग पूछते नहीं, बल्कि अच्छी तरह से जानते हैं कि महेंद्र सिंह कौन हैं। यह साबित करता है कि एक ‘बुलंद आवाज़’ को जिस्मानी तौर से चुप करने की साज़िश इस क़दर नाकाम हो गई कि वह आवाज़ ‘प्रतिरोध की विचारधारा’ बनकर हमेशा के लिए अमर हो गई। वे हमारे विचारों में, किसी न किसी रूप में आज भी जिंदी हैं। 
कॉमरेड महेंद्र सिंह झारखंड की राजनीति में एक ऐसा नाम बन चुके हैं, जिनकी संघर्षशील विरासत और वाम-लोकतांत्रिक वैचारिकी का असर आज भी दिल-दिमाग में गहराई से महसूस किया जाता है। एक ऐसे जननेता, जिनका प्रभाव उनके जाने के बाद भी ज़रा भी कम नहीं हुआ है।
क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष- किसी भी राजनेता में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वह महेंद्र सिंह और बेदाग़ जन-राजनीति पर कोई उंगली उठा सके।
भाकपा (माले) के एक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने “चुनाव बहिष्कार” के लिए जन-अभियान चलाते हुए संगठनबद्ध राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। कालांतर में जब पार्टी ने ‘चुनाव में भागीदारी’ का फैसला किया, तो गरीब-गुरबों, वंचितों के साथ-साथ लोकतंत्र-पसंद मध्यवर्ती नागरिक समाज की स्वतंत्र राजनीतिक दावेदारी को स्थापित करने तथा ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था’ में ‘लोक’ की केंद्रीय हैसियत स्थापित करने के लिए चुनावी संघर्ष की संभावनाएं विकसित करने की जद्दोजहद में कूद पड़े।


1985 में वे जेल से पहला चुनाव लड़े और हार गए, लेकिन आम जन के सवालों पर अपना संघर्ष अभियान जारी रखा। जिससे फ़रवरी 1990 आते-आते राजनीतिक परिदृश्य को पार्टी के पक्ष में बदलने में आखिरकार सफल हो गए और उसके बाद से वे विधानसभा का कोई चुनाव नहीं हारे। 1990 में बिहार विधानसभा में इंडियन पीपुल्स फ्रंट के सात-सदस्यीय विधायक दल के सर्वमान्य नेता चुने गए। “पूंजीवादी राजनीति” के भ्रमों-प्रलोभनों को धता बताते हुए, प्रतिबद्ध और चौकस जन-राजनीति करते हुए कम्युनिस्ट संकल्पों पर जोशो-ज़ज़्बे के साथ आगे बढ़कर सक्रिय रहे।
जब झारखंड प्रदेश अलग राज्य का स्वरूप ग्रहण किया, तो झारखंडी जनता की उम्मीदों के विपरीत “आंकड़ों के खेल” से ऐसी ताक़तें प्रदेश की सत्ता में क़ाबिज़ हो गई थीं। ऐसे में जन-आकांक्षाओं को प्रदेश की राजनीति के केंद्र में कैसे स्थापित किया जाए, इसे लेकर तत्कालीन विपक्षी विधायकों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने सभी विपक्षी विधायकों से ज़ोर देकर कहा- हमें कैसे लड़ना है, महेंद्र जी हमारे साथ हैं, तो हम सबको पूरी शिद्दत के साथ इनसे जन-संघर्ष का कौशल सीखने की ज़रूरत है। (महेंद्र सिंह जी ने आपसी चर्चा में बताया था)
भाकपा (माले) के लाल झंडे के सिपाही और सामान्य कार्यकर्ता बनकर- “यह तो होना ही था” अथवा “अब क्या किया जा सकता है?” क़िस्म के निराशावाद और उदासीनता के बरख़िलाफ़ हमेशा जनता की प्रतिवादी सक्रियता और संगठित जन-पहलकदमी को गतिशील बनाकर जन-विरोधी शासन और उसके तंत्र पर जन-दबाव को सफल-संभव बनाना उनकी कार्यदिशा रही। यही वजह थी कि उन्हें सामाजिक अन्याय, सत्ता-शासन के जन-विरोधी कृत्यों व जनता की आर्थिक लूट की हर कारगुज़ारी का भंडाफोड़ करते हुए देखा गया। शासन और उसके तंत्र द्वारा किए गए हर दमन का जी-जान से ज़ोरदार विरोध करते हुए देखा गया। राजनेताओं के “मसीहाई अंदाज़ की नेतागिरी” से परे, आम जन की एकजुट सक्रियता से शक्तिशाली जन-दबाव खड़ा करना उन्होंने हमेशा ही सर्वोपरि बनाया।
विधानसभा कार्रवाइयों के दौरान एक बार सत्तारूढ़ और कतिपय विपक्षी विधायकों ने मिलकर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मर्यादा-हनन के झूठे आरोपों से उन्हें सदन में घेरने की साज़िश की। उसी समय उन्होंने विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर तत्काल विधायक आवास खाली कर दिया। बाद में विधानसभा अध्यक्ष को सदन की ओर से माफ़ी मांगते हुए इस्तीफ़ा अस्वीकार किए जाने के उपरांत वे पुनः सदन में आए।
जन सभाओं और अभियानों से लेकर चुनावी सभाओं तक में अपने बुलंद संबोधनों से हमेशा ही लोगों से यही कहा, 
“हम आपसे कोई वादा नहीं करेंगे, लेकिन जूते की तरह पार्टी नहीं बदलेंगे और आपका वोट कभी नहीं बदलेंगे। हम आपकी ज़िंदगी की हर लड़ाई लड़ेंगे। हमारे लोग मारे जा सकते हैं, जेल जा सकते हैं, लेकिन आपके साथ कभी धोखा नहीं दे सकते, इस बात का भरोसा आपको दे सकते हैं।”
अपनी खनकती आवाज़ में हमेशा ही कहा कि राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं का जनता से “सिर्फ़ वोट लेने-देने का रिश्ता होता है। लेकिन हमारा रिश्ता आपसे ज़िंदगी के सभी सवालों से है। आपसे सामाजिक रिश्ते में आपके सवालों को हल करने का नाम माले है, महेंद्र सिंह है!”
आज भी उनकी गूंज से यही अनुगूंज सुनाई देती है कि—
“हो रहा है कोलाहल /
उठ रहे हैं हज़ारों हाथ /
क़ातिलों की गर्दन की ओर /
भीड़ के इस रुख़ पर /
जम्हूरियत और अहिंसा की /
बातें करने वालों ने /
साध रखी है चुप्पी!”
(महेंद्र सिंह के पैतृक गांव खंभरा, बगोदर में 16 जनवरी को उनका शहादत दिवस हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में इसी दिन नक्सलियों ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी थी)

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