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झारखंड छात्र आंदोलन : गांधीवादी रास्ते से भगत सिंह की राह तक पहुंचा आंदोलन, क्या हैं इसके मायने

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मनोज पाण्डेय
राजधानी रांची में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। लंबे समय से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने अब सरकार के रुख से नाराज होकर अपने संघर्ष की दिशा बदलने का ऐलान किया है। छात्र नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अब वे "गांधीवादी तरीका छोड़कर भगत सिंह के रास्ते पर चलेंगे"। 
सख्त रुख और इस्तीफे की मांग 
जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच के बैनर तले प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने राज्य सरकार पर उनकी मांगों की लगातार उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। आंदोलनकारियों ने पहली बार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस्तीफे की मांग भी उठाई है। छात्रों ने घोषणा की है कि वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए अपने आंदोलन को और तेज करेंगे, जिसके तहत मुख्यमंत्री आवास के घेराव जैसे बड़े कदम उठाए जाएंगे। छात्र मुख्य रूप से विवादित परीक्षाओं को रद्द करने और पूरे मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराने की मांग पर अड़े हुए हैं। 


गांधीवादी तरीका बनाम भगत सिंह का रास्ता 
छात्रों द्वारा आंदोलन की शैली बदलने के इस निर्णय के अपने वैचारिक, रणनीतिक और व्यावहारिक पहलू हैं, जिनको नफा-नुकसान के रूप में समझा जा सकता है। छात्रों का यह ऐलान इस बात का प्रतीक है कि लंबे धरने और वार्ताओं के बाद भी जब प्रशासनिक स्तर पर ठोस समाधान नहीं निकलता, तब युवाओं का धैर्य टूटने लगता है। हालांकि, वैचारिक रूप से भगत सिंह का मार्ग केवल आक्रोश का नहीं, बल्कि उच्च बौद्धिक क्षमता, निस्वार्थ त्याग और व्यवस्था परिवर्तन के स्पष्ट विजन का भी प्रतीक था। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि छात्र अपने इस नए तेवर के साथ किस प्रकार अपनी मांगों को लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए अंजाम तक पहुंचाते हैं।

शांतिपूर्ण, अहिंसक और सत्याग्रह आधारित
अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन जैसे उपवास, मार्च, और प्रार्थना सभाएं आम जनता और समाज के विभिन्न वर्गों को आसानी से आकर्षित करते हैं। ऐसे आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन और सहानुभूति भी मिलता है। इससे आंदोलन को नैतिक वैधता मिलती है। इसमें लोकतांत्रिक सीमाओं के भीतर रहकर बात मनवाने की कोशिश होती है, जिससे बड़े पैमाने पर हिंसक टकराव और बल प्रयोग की आशंका कम रहती है। शांतिपूर्ण तरीके से सरकार पर वैचारिक दबाव बनता है और प्रशासन के लिए दमनकारी कार्रवाई करना नैतिक रूप से कठिन होता है। ऐसा नहीं है कि इसका सिर्फ लाभ ही है, कई बार ऐसा देखा गया है कि यदि सत्ता पक्ष या प्रशासन सुस्त हो या तानाशाही रवैया अपनाए, तो गांधीवादी तरीकों से न्याय मिलने में काफी लंबा समय लगता है। कई बार लंबी चली शांतिपूर्ण लड़ाइयों को सत्ता द्वारा कमजोर मान लिया जाता है, जिससे आंदोलन करने वालों में निराशा या थकान पैदा होने लगती है।
आक्रामक, क्रांतिकारी और उग्र तेवर आधारित
भारत में गांधी औऱ भगत सिंह दोनों को पूजा जाता है, दोनों के आदर्श पर चलने की बात कही जाती है। किसी को छोटा या बड़ा के अंतर से नहीं देखा जाता है। लेकिन भगत सिंह की शैली का मुख्य लाभ यह होता है कि शासन-प्रशासन और मीडिया का ध्यान तुरंत खींचा जाता है। कड़े तेवर और आक्रामक रणनीतियां सरकार को बातचीत की टेबल पर आने के लिए मजबूर कर सकती हैं। युवाओं और छात्रों के भीतर का जोश और आक्रामकता उच्च स्तर पर बनी रहती है, जिससे आंदोलन में सुस्ती नहीं आती। मनोबल में वृद्धि उच्च स्तर पर देखने को मिलती है, लेकिन उग्र तेवरों के कारण पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, लाठीचार्ज और झड़पें बढ़ने का खतरा हमेशा बना रहता है, जिससे छात्रों को शारीरिक नुकसान पहुंच सकता है। आंदोलन के भटकाव का जोखिम होता है। आक्रामकता बढ़ने पर असामाजिक तत्व इसका फायदा उठाकर माहौल बिगाड़ सकते हैं, जिससे मुख्य मुद्दा पीछे छूट जाता है और आंदोलन की छवि को नुकसान पहुंच सकता है। प्रशासन को आंदोलन को कुचलने या कानूनी कार्रवाई करने का आधार मिल जाता है। 


तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण 
पुलिस की भाषा में अकसर आपको ये सुनने को मिलेगा कि स्थिति तनावपूर्ण है लेकिन नियंत्रण में है। छात्रों को भी आगे ये बेहद पैनी निगाह से देखना होगा कि इस आंदोलन का कोई फायदा ना उठा ले। छात्रों पर गैर कानूनी होने का आरोप ना चस्पा हो और ना ही प्रशासन के पास कानून के कड़े तेवर का प्रयोग करने का रास्ता हो। प्रदर्शन के दौरान कोई ऐसी स्थिति ना उत्पन्न हो जिससे मुद्दों पर बात कम और प्रदर्शन के तरीके और उसके फलाफल पर बातें ज्यादा होने लगे।

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Tags - Jharkhand Student Movement Student Protest Gandhian Movement Bhagat Singh Jharkhand Politics