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शहादत दिवस : कामरेड महेंद्र सिंह के संघर्षों से जन्मा एक ऐतिहासिक प्रतिरोध- आंखों देखा हाल

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विकास सिंह, बेरमो  
“क्रांतिकारी का अपना कोई घर नहीं होता। वह जहां रहता है, वहीं उसकी दुनिया होती है और वहीं से बदलाव के लिए संघर्ष शुरू करता है। हम ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जहां गरीबी, शोषण, ज़ुल्म और अन्याय का नामोनिशान न हो। आज यह जेल ही हमारी दुनिया है, इसलिए बदलाव की शुरुआत भी यहीं से होगी।” ये शब्द थे कामरेड महेंद्र सिंह के, जब 1985 में गिरिडीह जेल में पहली बार उनसे मेरा संपर्क हुआ।
आक्रामक मजदूर आंदोलनों के कारण मुझे CCA (Crime Control Act) के तहत गिरफ्तार कर गिरिडीह जेल भेजा गया था। जेल गेट पर ही उनसे पहली मुलाकात हुई। उन्होंने बेहद आत्मीयता से मुझे अपने साथ रहने का न्योता दिया। इसके बाद हम साथ ही रहने लगे। महेंद्र सिंह पहले से जेल में थे। कोयरीडीह दोहरे हत्याकांड में उन्हें प्रशासन ने साजिश के तहत अभियुक्त बना दिया था। उस समय गिरिडीह जेल की हालत भयावह थी।
कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार आम बात थी। अंग्रेज़ों के जमाने का पूरा दमनकारी सिस्टम जस का तस चल रहा था। हर वार्ड में प्रशासन द्वारा नियुक्त एक “मेठ” होता था, जिसका काम नए बंदियों को पीटना, यातनाएं देना और उनसे पैसे उगाहना था। यह पैसा ऊपर तक पहुंचता था।
राशन बिक जाता था। बंदियों को आधा पेट खाना भी नसीब नहीं होता था। गाली-गलौज और मारपीट रोज़मर्रा की बात थी।
रात-रात भर हम महेंद्र सिंह के साथ बैठकर इन हालात पर चर्चा करते और बंदियों को संगठित कर प्रतिरोध की योजना बनाते। खतरा हर कदम पर था। जेल प्रशासन के खुफिया दलाल—थोड़ी सी सुविधा और मार से बचने के बदले—हर जगह मौजूद थे। कहने का मतलब यह कि हमारे आसपास एक नहीं, कई “हरिराम नाई” थे।


जेपी आंदोलन के दौरान मैं कई बार जेल गया था, लेकिन ऐसी बर्बर सच्चाई से पहले कभी सामना नहीं हुआ था। इस बार मैं जेल व्यवस्था का असली चेहरा देख रहा था। जेल प्रशासन से संघर्ष की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
महेन्द्र सिंह मेरे लिए कृष्ण थे और मैं अर्जुन।
वे कुछ खूँखार बंदियों से राजनीतिक संवाद करते, उन्हें मार्क्सवादी विचारों से लैस करते और धीरे-धीरे विश्वासपात्र बनाते। उन्हीं के ज़रिये बाकी बंदियों तक पहुंच बनाई जा रही थी।
तैयारी चल ही रही थी कि एक घटना ने सब कुछ तेज कर दिया।
दोपहर के खाने के वक्त एक बंदी नमक मांगने भांसा (रसोई) गया। एक सिपाही ने उसे डंडा मार दिया। मैं पास ही खड़ा था। अपना गुस्सा काबू में नहीं रख सका। सिपाही से डंडा छीनकर मैंने उसे दो-तीन डंडे जड़ दिए।
घंटी बज गई। लाठीचार्ज हुआ। बेरहमी से पिटाई हुई।
लेकिन बंदियों ने खुद लाठियां खाईं, हमें बचाए रखा।
इस घटना से हमारी तैयारी को झटका लगा। प्रशासन हावी हो गया।


अब महेंद्र सिंह ने रणनीति बदली। उन्होंने जेल अधिकारियों और सिपाहियों के आपसी अंतर्विरोध को समझा और सिपाहियों को संगठित करना शुरू किया। इसी दौरान एक और घटना हुई। 23-24 साल की एक महिला अपने पति की हत्या के आरोप में जेल लाई गई। उस वक्त तक अधिकांश सिपाही महेंद्र सिंह के प्रभाव में आ चुके थे। उसी महिला की असली कहानी उन्हीं सिपाहियों ने हमें बताई।
असल में, उसके गोतिया लोगों ने संपत्ति विवाद में पति की हत्या की थी और साजिश कर महिला को फंसा दिया था।
इतना ही नहीं-जमुआ थाना में गिरफ्तारी के बाद थानेदार ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर जेल भेज दिया।
यह कहानी हमने जेल के हर बंदी को सुनाई।
यहीं से आंदोलन ने नया रूप लिया।
जेल में अधिकांश बंदी निर्दोष होते हैं—साजिशों के शिकार।
सभी बंदियों की सहानुभूति उस महिला के साथ जुड़ गई। न्याय के लिए संगठित संघर्ष शुरू हुआ।
बंदी नारे लगाते हुए कोर्ट जाते, नारे लगाते लौटते।
कोर्ट परिसर गूंजता था-
“कलावती को न्याय दो, बलात्कारी थानेदार को जेल भेजो।”
मामला अखबारों में आया। चर्चा फैलने लगी।
हमने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र भेजे।
नतीजा-
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के मुख्य सचिव को जांच का आदेश दिया।
हजारीबाग के कमिश्नर जांच में आए।
सच्चाई सामने आ गई।
महिला जेल से रिहा हुई।
जमुआ थाना का वह थानेदार बलात्कार के जुर्म में जेल गया।
यह पल निर्णायक था।
बंदियों में नया जोश पैदा हुआ।
जेल प्रशासन रक्षात्मक हो गया।
एक-दो झड़पों के बाद अधिकारियों ने घुटने टेक दिए।
इसके बाद जेल का आंतरिक प्रशासन बंदियों के हाथ में आ गया।
मेठ अब नियुक्त नहीं होते थे, वोट से चुने जाते थे।
राशन गोदाम निर्वाचित समिति के नियंत्रण में आए।
खाना ऐसा मिलने लगा, जैसा बड़े-बड़े घरों में भी न मिले।
इसी दौरान मुझे हाईकोर्ट में पेश किया गया।
CCA में वकील रखने का अधिकार नहीं था, इसलिए मैंने खुद बहस की।
मेरा डिटेंशन रद्द हुआ।
मेरे जेल से बाहर आने के बाद भी महेंद्र सिंह से संपर्क बना रहा।
बाद में वे भी हाईकोर्ट से बरी हुए और हम फिर साथ काम करने लगे।
जेल में रहते हुए महेंद्र सिंह ने कई दुर्दांत अपराधियों का अपराध-जगत से नाता तोड़कर उन्हें माले का कार्यकर्ता बनाया।
राजधनवार के विधायक राजकुमार यादव—जो 16 साल की उम्र में हत्या के झूठे आरोप में जेल गए थे—उसी समय महेंद्र सिंह के प्रभाव में आकर माले से जुड़े।
महेंद्र सिंह का व्यक्तित्व चुम्बकीय था।
व्यवहार में सरलता, विचारों में दृढ़ता।
जो एक बार संपर्क में आया, उनका मुरीद बन गया।
और भी कई घटनाएं हैं, जिनका ज़िक्र फिर कभी।
लेकिन इतना कहना ज़रूरी है कि महेंद्र सिंह की हत्या भाजपा सरकार और तत्कालीन एसपी दीपक वर्मा द्वारा झारखंड के गरीबों, गुरबों और मेहनतकश आवाम के खिलाफ किया गया सबसे बड़ा अन्याय है।
गिरिडीह जेल सिर्फ एक जेल नहीं रही- वह लोकतंत्र का पहला अभ्यास-स्थल बन गई।

(महेंद्र सिंह के पैतृक गांव खंभरा, बगोदर में 16 जनवरी को उनका शहादत दिवस हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में इसी दिन नक्सलियों ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी थी)


 

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