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जमशेदपुर में घास-फूस और पत्तों से साकार हुआ संताल-हो जनजातीय जीवन, पंडाल में दिखेगी गांवों की झलक

जमशेदपुर में घास-फूस और पत्तों से साकार हुआ संताल-हो जनजातीय जीवन, पंडाल में दिखेगी गांवों की झलक

जमशेदपुर 
Jamsedpur News: मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों में हल चलाते किसान, ढेंकी से धान कूटती महिलाएं और सिर पर टोकरी उठाकर चलती ग्रामीण स्त्रियां। प्रकृति के साथ कदमताल करता जनजातीय जीवन इन दिनों जमशेदपुर के गोलपहाड़ी रेलवे कॉलोनी में दुर्गापूजा पंडाल के माध्यम से जीवंत होता नजर आ रहा है। यहां झारखंड की ग्रामीण संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और लोककला का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। पंडाल में प्रवेश करते ही ऐसा एहसास होता है, मानो गांव की एक जीवंत तस्वीर आंखों के सामने उतर आई हो।

संताल और हो जनजातीय जीवन से प्रेरित है पंडाल
दरअसल,   सार्वजनिक दुर्गा पूजा कमिटी, रेलवे कॉलोनी गोलपहाड़ी का इस वर्ष का पूजा पंडाल झारखंड के संताल और हो जनजातीय इलाकों के ग्रामीण परिवेश से प्रेरित है। इसकी खासियत केवल इसकी विषयवस्तु ही नहीं, बल्कि इसे तैयार करने में इस्तेमाल की गई पारंपरिक सामग्रियां और कारीगरों की बारीक कारीगरी भी है। घास-फूस, ताल की छाल, ताड़ के पत्ते, सरकंडी की लकड़ी, बंगाल में मिलने वाले हुगला पत्ते, पुआल, धान और चटाई जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से पूरे पंडाल को आकर्षक रूप दिया गया है। इन सामग्रियों के माध्यम से ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

ढेंकी से धान कूटती महिलाओं की आकर्षक झांकी
पंडाल के सामने पहुंचते ही ग्रामीण जीवन का एक पारंपरिक दृश्य लोगों का ध्यान खींचता है। यहां पुआल, रस्सी, ताल के पत्तों और छाल की मदद से महिलाओं की ऐसी आकृतियां तैयार की गई हैं, जो पारंपरिक ढेंकी से धान कूटती नजर आती हैं। यह दृश्य उस ग्रामीण जीवन की याद दिलाता है, जहां धान कूटना केवल अनाज तैयार करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम और परंपरा का भी हिस्सा रहा है। कारीगरों ने प्राकृतिक सामग्रियों से इन आकृतियों को इतनी बारीकी से तैयार किया है कि वे अपने काम में जुटी जीवंत महिलाओं जैसी प्रतीत होती हैं।

बैलों से खेत जोतता किसान बना आकर्षण का केंद्र
मुख्य प्रवेश द्वार के समीप बैलों की सहायता से खेत जोतते किसान की आकर्षक आकृति देखने को मिलती है। घास-फूस और पत्तों से तैयार यह प्रस्तुति पारंपरिक खेती-किसानी की उस तस्वीर को सामने लाती है, जिसने सदियों से ग्रामीण समाज की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली को आधार दिया है। बैलों के साथ खेत तैयार करता किसान ग्रामीण मेहनत, कृषि परंपरा और प्रकृति पर निर्भर जीवन का प्रतीक बनकर उभरता है। यह झांकी दर्शाती है कि खेतों में फसल लहलहाने और घरों तक अनाज पहुंचने के पीछे किसानों की अथक मेहनत होती है।

घास-फूस की नक्काशी से उकेरी गई गांवों की तस्वीर
पंडाल के भीतर प्रवेश करते ही ग्रामीण परिवेश की यह दुनिया और विस्तृत हो जाती है। लकड़ी और प्लाई पर घास-फूस की मदद से की गई बारीक नक्काशी के जरिए झारखंड के गांवों की जीवनशैली को दर्शाने का प्रयास किया गया है। खेतों की ओर हल लेकर जाता किसान हो या सिर पर टोकरी उठाकर सामान ढोती महिलाएं, हर आकृति ग्रामीण जीवन के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती है। प्राकृतिक सामग्रियों, पारंपरिक शिल्प और बारीक नक्काशी के मेल से तैयार यह सजावट पंडाल को केवल धार्मिक परिसर तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे ग्रामीण संस्कृति की कलात्मक झांकी का रूप देती है।

प्राकृतिक सामग्रियों से कारीगरों ने रची अनूठी दुनिया
गोलपहाड़ी के इस पंडाल की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां आधुनिक सजावटी सामग्रियों की चमक के बजाय घास, पत्तों, पुआल और चटाई जैसी पारंपरिक चीजों को कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया गया है। आमतौर पर ग्रामीण जीवन में इस्तेमाल होने वाली इन सामग्रियों से कारीगरों ने एक ऐसा संसार रचा है, जिसमें प्रकृति, श्रम और परंपरा का सुंदर मेल दिखाई देता है। पंडाल की सजावट में इस्तेमाल की गई प्रत्येक सामग्री और तैयार की गई आकृति कारीगरों की कल्पनाशीलता, धैर्य और मेहनत को दर्शाती है।

मां दुर्गा की दिव्य प्रतिमा बढ़ा रही पंडाल की भव्यता
ग्रामीण जीवन की इस पूरी झांकी के केंद्र में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। मां का दिव्य स्वरूप पंडाल की सुंदरता को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है। एक ओर झारखंड की धरती, खेत-खलिहान और जनजातीय ग्रामीण जीवन की झलक दिखाई देती है, तो दूसरी ओर शक्ति की अधिष्ठात्री मां दुर्गा का दिव्य दरबार आस्था का संदेश देता है। ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक भावना का यह संयोजन पंडाल को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।

ग्रामीण संस्कृति और जनजातीय परंपरा को सहेजने की पहल
दुर्गापूजा के पंडाल अक्सर अपनी भव्यता, आकर्षक रोशनी और विशाल निर्माण के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन गोलपहाड़ी का यह पंडाल प्राकृतिक सामग्रियों और ग्रामीण जीवन के दृश्यों के कारण अपनी अलग पहचान बना रहा है। संताल और हो जनजातीय क्षेत्रों के ग्रामीण परिवेश से प्रेरित यह प्रस्तुति झारखंड की सांस्कृतिक विविधता, खेती-किसानी और पारंपरिक जीवनशैली को करीब से समझने का अवसर देती है। इस दुर्गापूजा में जमशेदपुर के गोलपहाड़ी रेलवे कॉलोनी स्थित  सार्वजनिक दुर्गा पूजा कमिटी के पंडाल में मां दुर्गा के दर्शन के साथ झारखंड के ग्रामीण संसार की इस अनूठी झांकी का भी अनुभव किया जा सकता है। घास-फूस, पत्तों, पुआल और कारीगरों की कल्पनाशीलता से आकार लिया यह पंडाल केवल मां दुर्गा का दरबार नहीं, बल्कि झारखंड की मिट्टी, मेहनतकश ग्रामीण जीवन और जनजातीय संस्कृति को कलात्मक रूप में सहेजने की एक सुंदर कोशिश है।

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