द फॉलोअप डेस्क
गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड अंतर्गत चिंगरी नवाटोली गांव आज उस समय श्रद्धा, उत्साह और आदिवासी स्वाभिमान की ऊर्जा से भर उठा जब हजारों की संख्या में राज्यभर से आए टाना भगत अनुयायियों ने टाना आंदोलन के जनक और स्वतंत्रता सेनानी जतरा टाना भगत की जयंती धूमधाम से मनाई। इस अवसर पर पूरा गांव सत्य और अहिंसा के जयघोष से गूंज उठा। हालांकि राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार किसी कारणवश समारोह में शामिल नहीं हो सके।
आदिवासी समाज की पारंपरिक पड़हा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रांची स्थित टाना भगत अतिथिगृह, बनहोरा में हाल ही में नए पदाधिकारियों का चयन किया गया था। आज के समारोह में सभी नए पदाधिकारियों ने शपथ ग्रहण किया। समारोह की भव्यता देखते ही बन रही थी। दूर-दराज़ से अनुयायी पारंपरिक परिधानों और अनुशासित जीवनशैली के साथ एक दिन पहले ही चिंगरी पहुँच गए थे। गांव की पगडंडियाँ और प्रांगण भगवा, सफेद और हरे रंग के ध्वजों तथा नारों से गूंज उठे।
28 सितम्बर 1888 को जन्मे जतरा उरांव (बाबा जतरा टाना भगत) ने बचपन से ही अंग्रेजी हुकूमत और जमींदारी शोषण का दर्द देखा। 1912 में उन्होंने शराब, पशुबलि और सामाजिक कुरीतियों का त्याग कर आध्यात्मिक-सामाजिक आंदोलन की नींव रखी। यही आंदोलन आगे चलकर टाना भगत आंदोलन के रूप में संगठित हुआ जिसने अंग्रेजी शासन और कर व्यवस्था के खिलाफ एकजुट संघर्ष का रास्ता दिखाया।
1914 में ब्रिटिश हुकूमत ने बाबा जतरा टाना भगत को जेल भेज दिया। जेल से रिहा होने के कुछ समय बाद ही उनका स्वर्गवास हो गया। इसके बावजूद आंदोलन की मशाल बुझी नहीं, बल्कि हर गांव और टोले में जलती रही। उनका आंदोलन बाद में महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा से जुड़ गया। कर न देने, बेगार का विरोध करने और स्वदेशी अपनाने की विचारधारा ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई। इसी दौरान लोहरदगा जिले के कुडू थाना क्षेत्र में पहली बार भारत का तिरंगा फहराया गया।
समारोह में हजारों श्रद्धालु बाबा की समाधि स्थल और पूरे गांव में जुटे। राजी देवान बसंत कुमार भगत ने कहा कि बाबा जतरा टाना भगत की शिक्षाएं आज भी समाज के लिए दीपस्तंभ हैं। कार्यक्रम के सचिव राजेश टाना भगत ने कहा कि बाबा केवल आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। सामाजिक कार्यकर्ता व आदिवासी नेता अनिल अमिताभ पन्ना ने कहा कि बाबा ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका जीवन हर झारखंडी युवा के लिए प्रेरणा है। सीआरपीएफ के डीआईजी रविन्द्र भगत ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि बाबा का जीवन त्याग, सेवा और अनुशासन का जीवंत उदाहरण है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जनार्दन टाना भगत ने की। उन्होंने कहा कि राज्य के विभिन्न जिलों से आए अनुयायियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रिय सहभागिता ने समारोह को ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बना दिया। विशेष अतिथियों में झारखंड आंदोलनकारी विनोद भगत, बॉबी भगत, विश्वनाथ भगत, डॉ. नारायण भगत, डॉ. बिनीत भगत, डॉ. मनती उरांव, डॉ. सुशील उरांव, डॉ. विश्वनाथ तिर्की, प्रो. महेश तिर्की, राजबेल उरांव, बधन उरांव और पश्चिम बंगाल से महादेव टाना भगत उपस्थित रहे।
समारोह को सफल बनाने में विनय टाना भगत, सुखदेव टाना भगत, गुरुचरण टाना भगत, मधुसूदन टाना भगत, रामजीत टाना भगत, उमेश टाना भगत, अरविंद टाना भगत, जानकी टाना भगत, यशोदा टाना भगत, भूषण टाना भगत, अनिल पन्ना, सिकंदर, मंत्री, मंगले, बालेश्वर, बिहारी, चेतन, पवित्र, हीरामनी, बुधमनिया, सुशीला बसंती, तेतला, मंगल, शिबु, विश्वा, बरतिया टाना सहित हजारों अनुयायियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
