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अविनाश कुमार के भाई अमिताभ ठाकुर ने श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के CEO के लिए आवेदन किया

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द फॉलोअप, रांची
उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित आईपीएस और झारखंड के मुख्य सचिव अविनाश कुमार के बड़े भाई अमिताभ ठाकुर ने भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) पद के लिए आवेदन दिया है। मालूम हो कि अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा इस्तीफा दे चुके हैं। ट्रस्ट ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे हैं। अमिताभ ठाकुर पूर्व आईपीएस अधिकारी और आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उन्होंने अपने आवेदन में भारतीय पुलिस सेवा एवं लोक प्रशासन में लगभग तीन दशकों के अनुभव सहित सुरक्षा प्रबंधन, सतर्कता, विधिक एवं प्रशासनिक मामलों, कार्मिक प्रशासन तथा संस्थागत समन्वय के अनुभव का उल्लेख किया है।

आवेदन में अमिताभ ठाकुर ने खुद को हिन्दू सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से संबद्ध बताते हुए भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परम्पराओं तथा भगवान श्रीराम के मर्यादा, न्याय, कर्तव्यनिष्ठा और लोककल्याण के आदर्शों के प्रति अतीव सम्मान होने की बात कही है। ट्रस्ट से सोमवार को अपने अधिकृत सोशल मीडिया एक्स के अकाउंट पर आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदकों के साक्षात्कार 18 जुलाई को शाम 4 बजे होंगे। यहां मालूम हो कि अमिताभ ठाकुर अपने सेवा काल में अक्सर चर्चा में रहे।


2015 में अमिताभ ठाकुर ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने उन्हें फोन पर धमकी दी। उन्होंने कथित बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सार्वजनिक की। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा। मुलायम सिंह प्रकरण के तुरंत बाद एक महिला ने अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी नूतन ठाकुर पर नौकरी का झांसा देकर दुष्कर्म कराने का आरोप लगाया था। बाद की जांच में पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर ठाकुर को क्लीन चिट दी और शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराने की कार्रवाई की। 2015 में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) की जांच भी शुरू हुई थी। बाद की जांच में आरोप सिद्ध नहीं हुए और उन्हें इस मामले में भी राहत मिली। केंद्र सरकार ने मार्च 2021 में उन्हें "जनहित" का हवाला देते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) दे दी। ठाकुर ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि सरकार ने विभागीय जांचों के आधार पर कार्रवाई की। उनके खिलाफ लंबित विभागीय मामलों को 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने में पूरा करने का निर्देश दिया।

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