द फॉलोअप डेस्क
सावन का पावन महीना चल रहा है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज पहुंचकर उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरते हैं और बाबाधाम देवघर की ओर पैदल कांवर यात्रा पर निकलते हैं। यह यात्रा लगभग 110 किलोमीटर लंबी होती है, जिसे भक्तगण पूरे श्रद्धा और संयम के साथ तय करते हैं। इनमें अधिकतर श्रद्धालु उपवास में रहते हैं। उपवास के दौरान खान-पान में सीमित विकल्पों के कारण कई बार उन्हें फलाहार के लिए खास इंतज़ाम करने पड़ते हैं। ऐसे में एक अनोखी और ऊर्जा से भरपूर व्यंजन कांवरियों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है वो है केले की फलाहारी जलेबी।
आपने अब तक मैदा या उड़द की दाल से बनी जलेबी जरूर खाई होगी, जो उपवास में वर्जित मानी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी फलाहारी जलेबी खाई है जो पके केले, उबले आलू, आरारोट, गाढ़े दूध, दही और सूखे मेवों से बनाई जाती है?आइयेअ आपको बताते है इस खास जलेबी के बारे में, जो कांवरियों के लिए स्वाद और ऊर्जा का अद्भुत संगम है।

बांका जिले के कच्ची पथ पर, “जलेबिया मोड़” नामक स्थान पर यह खास जलेबी 20 रुपये प्रति पीस में मिलती है। इसे खाने वालों का कहना है कि एक बार जो इसका स्वाद चखता है, वह हर साल कांवर यात्रा के दौरान इसे ढूंढता है।
इस जलेबी को मैदा, बेसन या किसी भी प्रकार के अनाज से नहीं बनाया जाता है। इसके लिए पके केले, उबले आलू, आरारोट, दही, गाढ़ा दूध और मेवों को मिक्सी में पीसकर एक खास घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को जलेबी के आकार में तला जाता है और फिर गरमा-गरम चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है। अंत में, यह स्वादिष्ट जलेबी कांवरियों को परोसी जाती है।
यह जलेबी सिर्फ स्वाद में ही नहीं, बल्कि ऊर्जा देने में भी अद्भुत है। कांवर यात्रा के दौरान जब कांवरियों के कदम थकने लगते हैं, तब यह जलेबी उनके लिए संजीवनी बन जाती है। इसे खाने से न केवल शरीर को ताकत मिलती है, बल्कि मन को भी शांति और संतोष का अनुभव होता है। भक्तों के अनुसार, यह जलेबी खाते ही कांवरियों के पैरों में नई ऊर्जा आ जाती है।
यह खास जलेबी आपको आम दिनों में या चौक-चौराहों पर नहीं मिलेगी। इसे सिर्फ सावन के महीने में, कांवर यात्रा के मार्ग में, विशेषकर सुल्तानगंज से 60 किलोमीटर आगे, तैयार किया जाता है। इसका स्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं को पूरे एक साल का इंतज़ार करना पड़ता है।
