हजारीबाग
किसी भी शहर का आईना उसका मेन रोड होता है लेकिन हजारीबाग का मेन रोड आज विकास की चमक नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का चेहरा दिखा रहा है। सुबह के वक्त जब शहर नींद से जाग रहा होता है, तब यहां की महिलाएं अपने घरों से एक-दो किलोमीटर दूर बर्तन और डब्बे लेकर पानी की तलाश में निकल पड़ती हैं। सिर पर पानी का बोझ और दिल में व्यवस्था के प्रति नाराज़गी लिए ये महिलाएं उस सड़क से गुजरती हैं, जहां कभी भी भारी वाहन गुजर सकते हैं। एक तरफ महिलाएं एक-एक बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो दूसरी तरफ छठ तालाब के समीप सड़क के बीचों-बीच फटी पाइपलाइन से लाखों लीटर पानी ऐसे बह रहा है, मानो विकास खुद सड़क फाड़कर गंगा प्रवाहित कर रहा हो।

वादों की बाल्टी भरकर जाते हैं
सरकारी फाइलों में हर घर तक पानी पहुंच चुका है। नेता जी के भाषणों में जल संकट खत्म हो चुका है। सोशल मीडिया पोस्ट में विकास दौड़ रहा है, लेकिन ज़मीन पर आज भी महिलाएं पानी के लिए पैदल मार्च कर रही हैं। चुनाव आते ही जनप्रतिनिधि आते हैं वादों की बाल्टी भरकर जाते हैं, और फिर पांच साल तक जनता खाली बाल्टी लेकर पानी ढूंढती रह जाती है। एक महिला बताती हैं कि चुनाव में नेता आते हैं, वादा करते हैं और फिर भूल जाते हैं। पानी नहीं लाएंगे तो पकाएंगे कैसे, और पिएंगे नहीं तो जिएंगे कैसे।
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योजनाएं सिर्फ पोस्टर और होर्डिंग तक सीमित
सवाल यह भी है कि जब झारखंड सरकार की नीर-वीर योजना और केंद्र सरकार की हर घर नल योजना हर घर तक पेयजल पहुंचाने का दावा करती हैं, तो आखिर ये महिलाएं आज भी सड़कों पर पानी ढोने को क्यों मजबूर हैं। क्या योजनाएं सिर्फ पोस्टर और होर्डिंग तक सीमित हैं। क्या पाइपलाइन केवल उद्घाटन के लिए बिछाई गई थी। और क्या जनता सिर्फ वोट देने के लिए याद रखी जाती है। हजारीबाग में इस वक्त हालात ऐसे हैं कि एक तरफ लोग पानी के लिए तरस रहे हैं और दूसरी तरफ सरकारी पानी सड़क पर बह-बहकर प्रशासन की कार्यशैली का मज़ाक उड़ा रहा है। फिलहाल सवाल वही है कि आखिर जनता कब तक पानी के लिए भटकेगी। और सत्ता व सिस्टम में बैठे लोग अपनी "प्रमोशनल नींद" से आखिर कब जागेंगे।