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हजारीबाग : लकवाग्रस्त पिता की लाठी बनी बेटी, संघर्षों से सींचा सपना, JPSC पास कर शोभा बनी अफसर

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द फॉलोअप डेस्क
हजारीबाग की गलियों में एक ऐसा नाम गूंज रहा है, जो सिर्फ रैंक से नहीं, रिश्तों की सच्ची तपस्या से बना है, शोभा कुमारी। JPSC परीक्षा में 263वीं रैंक हासिल करने वाली शोभा की कहानी सिर्फ एक सफर नहीं है, बल्कि वो जंग है जो एक बेटी ने पिता के टूटे सपनों को फिर से जोड़ने के लिए लड़ी। शोभा के पिता दीपक राम कभी एक निजी अस्पताल में चौकीदारी करते थे। 7,000 रुपये की तनख्वाह में भी उन्होंने बेटी को स्कूल भेजना नहीं छोड़ा। फिर एक दिन किस्मत ने उन्हें लकवाग्रस्त कर दिया। बिस्तर पर पड़े-पड़े उन्होंने सिर्फ एक बात दोहराई “मेरी बेटी अफसर बनेगी।”
पिता का सपना तब और गहरा हो गया जब एक दुर्घटना ने उन्हें और भी तोड़ दिया। लेकिन उस टूटन के बीच खड़ी रही उनकी बेटी शोभा जो हर दिन काम पर जाती, लौटकर पढ़ाई करती, और हर रात बगैर शिकायत सो जाती सपने सीने में छुपाए। सिर्फ 18 साल की उम्र में शोभा ने परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया। पोस्टल असिस्टेंट बनीं, फिर विभागीय परीक्षा देकर MTS में चयन पाया। हर महीने की तनख्वाह से घर चलता, और मन में चलता सिर्फ एक सपना पापा का सपना।

हर साल जब स्कूल में दाखिले का समय आता, मां महिला समूह से 35,000 रुपये का कर्ज लेकर फीस भरतीं। कर्ज चुकाने के लिए मां ने अपने गहने गिरवी रखे, खेत गिरवी रखे, कई बार भूखे रहकर बेटी की किताबें खरीदीं। शोभा जानती थी उसका हर नंबर मां की नींद का कर्ज चुका रहा है।
कोचिंग के पैसे नहीं थे, किताबें दोस्त उधार देते थे। बिजली नहीं होती तो मोमबत्ती जलाकर पढ़ती थीं। कई बार परीक्षा से एक दिन पहले ड्यूटी खत्म करके लौटती थीं, पर आंखों में नींद नहीं होती सिर्फ सवाल होते और जवाब ढूंढ़ती शोभा। JPSC के परिणाम में शोभा का नाम आया 263वीं रैंक। घर में सन्नाटा था फिर मां रो पड़ीं, पापा ने कांपते हाथों से आशीर्वाद दिया। शोभा चुप थीं क्योंकि उस दिन वो मुस्कुरा नहीं सकीं, रो नहीं सकीं बस पापा की आंखें देखती रहीं जिनमें पहली बार एक टूटा सपना चमक रहा था।

अब जब शोभा ऑफिसर बनेंगी, वो सिर्फ खुद के लिए नहीं, अपने पिता के लिए, उस मां के लिए बनेंगी जिन्होंने हर सुबह भूख से लड़कर बेटी को किताब दी,एक बेटी ने दिखाया कि हिम्मत विरासत से नहीं, इरादे से आती है। शोभा ने भावुक होते हुए बताया कि पापा चल नहीं सकते थे, पर मैं दौड़ी। मां भूखी रहीं, ताकि मैं पढ़ सकूं। मैं कैसे हार जाती? शोभा की ये कहानी हर उस बेटे-बेटी को समर्पित है जो हालातों से नहीं डरते, और हर उस माता-पिता को जो सपनों में निवेश करते हैं चाहे हालात कुछ भी हों।


 

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