logo

रांची : ED को सीएम से जुड़ा कोई साक्ष्य मिला होगा, इसलिए भेजा समन- प्रतुल शाहदेव

723.jpg

रांची:
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (CM Hemant Soren) को ED ने समन भेजकर 3 नवंबर यानि कल पूछताछ के लिए बुलाया है। इसे लेकर विपक्षी दल लगातार सत्ता पक्ष पर हमलावर है। BJP नेता प्रतुल शाहदेव (Pratul Shahdev) ने इस मुद्दे पर सीएम पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि सीएम और उनके सहयोगियों ने पिछले तीन साल तक प्रदेश में भष्ट्राचार का खेल खेला है। ईडी को सीएम से जुड़ा कोई साक्ष्य मिला होगा, इसलएि उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का मानना है कि भष्ट्र आचरण वालों को कोई राहत नहीं दी जाएगी। यदि आप निर्दोष हैं तो किसी चीज से डरने की जरूरत नहीं है।

इस सरकार ने खनन संपदा जमकर लूटा
प्रतुल शाहदेव ने कहा जो पार्टी जल,जंगल और जमीन का नारा देकर सत्ता में आई थी उन्होंने राज्य की खनन संपदा का जमकर लूटा है। ईडी का पहले आंकलन था कि सिर्फ साहिबगंज जिले में 100 करोड़ की अवैध खनन हुई है। मगर 2 महीने के अंदर ही ईडी ने इसे रिवाईज किया। कहा, 1000 करोड़ का खनन घोटला केवल साहिबगंज जिला में हुआ है। राज्य में ऐसे करीब 12-13 जिले है जहां खनिज पदार्थ है।


सीएम के कई करीबी जेल में बंद
सीएम पर निशाना साधते हुए प्रतुल शाहदेव ने कहा कि उनके विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा जिन्हें संथाल परगना का तथाकथित सीएम कहा जाता है वो जेल में है। इसके अलावा अमित अग्रवाल और प्रेम प्रकाश जिनकी सियासी गलियारों में काफी पहुंच थी, वो भी आज ईडी की गिरफ्त में हैं।

सीएम ने सारा हक छीना
JMM ने आरोप लगाया है कि सीएम अदिवासी हैं इसलिए उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। इस संबंध में प्रतुल ने कहा कि इस सरकार ने अदिवासियों का सारा हक छीन लिया है। अब केवल By the Soren (बाई दी सोरेन), Of the Soren (ऑफ दी सोरेन) और For the Soren (फॉर दी सोरेन) बनकर रह गई है। मुख्यमंत्री ने सभी माइनिंग लिज अपने करीबियों को दिया है। ऐसे में इनके लिए आदिवासी का मतलब केवल सोरेन परिवार है।


राज्यपाल ने बड़ा उदाहरण किया पेश
राज्यपाल रमेश बैस की रायपुर में दिए गए एटम बम फटने वाले बयान पर प्रतुल ने कहा कि हमने खुद सीएम की शिकायत की थी। कहा था कि सीएम ने सत्ता में रहते हुए माइनिंग लिज लिया है। इस बात को लेकर राज्यपाल ने इलेक्शन कमीशन की राय मांगी। जिसके बाद इलेक्शन कमीशन ने बात की सच्चाई का पता लगाया। ये सारी बात सत्यापित होकर वापस इलेक्शन कमीशन के पास पहुंचा। जिसके बाद राज्यपाल को एक लिफफा सौंपा गया। राज्यपाल अगर चाहते तो पहली बार में ही फैसला ले सकते थे। लेकिन वे दूसरी बार फिर से राय ले रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा उदाहरण है।