द फॉलोअप डेस्क
लोहरदगा जिले की आदिवासी महिला एतवनिया उरांव ने गांव-गांव, घर-घर में अपनी एक नई पहचान बनाई है। यह पहचान उनके लिए "डॉक्टर दीदी" के रूप में प्रचलित हो गई है। हालांकि एतवनिया उरांव ने मैट्रिक की परीक्षा भी पास नहीं की है, लेकिन उनके मजबूत इरादों ने उन्हें एक ठोस लक्ष्य दिया है।
एतवनिया उरांव की कहानी किसी आम महिला से अलग नहीं है। 18 साल की उम्र में शादी होने के बाद बच्चों को संभालने के लिए उन्हें रोज लोहरदगा से रांची ट्रेन से मजदूरी करने के लिए आना-जाना पड़ता था। लेकिन उन्होंने स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया।
एतवनिया उरांव ने लोहरदगा में अग्रणी बैंक ऑफ इंडिया के ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) से पशु मित्र का प्रशिक्षण प्राप्त किया और अब पशुओं को वैक्सीन देकर उन्हें बीमार होने से बचा रही हैं। अब एतवनिया बरसात के मौसम में बीमार होने वाली बकरियों को बचाने के लिए पहले ही इंजेक्शन देने का काम कर रही हैं। तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर अब वह गांव-घर में पशुओं को बचाने और ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में जुटी हुई हैं।
एतवनिया का कहना है कि समय पर ग्रामीणों की बकरियों को दवा और इंजेक्शन मिल जाने से वे जीवित रहती हैं और नुकसान नहीं होता है। एतवनिया कहती हैं कि स्वरोजगार से जुड़कर अब अच्छा लगता है, लोग "डॉक्टर दीदी" बोलकर बुलाते हैं। गांव में नाम के साथ-साथ आमदनी भी हो रही है, अब मजदूरी नहीं करनी पड़ती।
वहीं, आरसेटी के निदेशक का कहना है कि महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए 64 प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसका लाभ लोहरदगा जिले की बेरोजगार महिलाओं को मिल रहा है और निरंतर महिलाएं अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर आगे बढ़ रही हैं।
