सुशील सिंह/गुमला:
झारखंड के गुमला में किसान, मौसम और सरकारी उदासीनता की दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर तो उन्हें मानसून की बेरुखी ने परेशान किया है, तो दूसरी तरफ वे विभागीय लापरवाही से हलकान हैं। जुलाई बीतने को है, लेकिन धान की रोपाई पूरी नहीं हो पाई है। किसानों की शिकायत है कि उन्हें न तो बीज समय पर मिलता है और ना ही सिंचाई की सुविधा ही पर्याप्त है। किसान अपनी पूंजी लगाकर बीज खरीद रहे हैं। सिंचाई के लिए भी इंतजाम खुद करना पड़ता है। इससे खेती की लागत कई गुना बढ़ जाती है। सरकार ने किसानों की सहायता के लिए किसान मित्र की नियुक्ति की थी, लेकिन आरोप है कि वे ग्रामीण इलाकों में नहीं जाते।
किसानों को सरकार से बहुत शिकायतें हैं
झारखंड में मानसून की बारिश औसत से कम हुई है। इस साल मानसून ने दस्तक भी देर से दी। ये समय धान की रोपाई का है और खेतों में पर्याप्त पानी होना चाहिए। कम बारिश होने की वजह से किसान नदी, तालाब और डोभा जैसे जलाशयों पर निर्भर हैं। हालांकि, इसके लिए वाटर पंप सेट चाहिए। किसान शनिचरवा खारिया की शिकायत है कि यदि सरकार ने पंप सेट मुहैया करा दिया होता तो बड़ी राहत मिलती।
किसान नीतीश कुमार का कहना है कि मानसून की बेरुखी, अधिक लागत, कम मुनाफा और सरकारी सहायता में कमी की वजह से कृषक परिवारों की युवा पीढ़ी खेती-किसानी से दूर जा रही है। किसानों की शिकायत है कि वादों जितना काम सरकार धरातल पर नहीं कर पा रही है। योजनाओं को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि लोग खेती छोड़कर रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन करते हैं या फिर दूसरा व्यवसाय ढूंढ़ते हैं। खासतौर पर युवा पीढ़ी को ऐसा लगने लगा है कि खेती मुनाफे का सौदा नहीं है।
किसान रामजीत प्रसाद की शिकायत है कि विभागीय कार्यालय में भी सही जानकारी नहीं दी जाती। सिंचाई की सुविधायें पर्याप्त नहीं हो तो कौन सी फसल लगानी चाहिए। पानी के अभाव में कौन सा बीज बोना है। खाद कैसा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, इसकी जानकारी एक ग्रामीण किसान के पास नहीं है। यदि सही जानकारी और आर्थिक सहायता मिले तो खेती मुनाफे का सौदा बन सकती है।

जिला कृषि पदाधिकारी ने शिकायतों पर क्या कहा!
जिला कृषि पदाधिकारी शुभम प्रिया ने बताया कि धान के बीज की खरीददारी लैम्प्स के जरिये होती है। उन्होंने दावा किया कि लैम्पस के लोगों ने ही टार्गेट के अनुपात में कम ड्राफ्ट लगाया, जिससे बीज का उठाव कम हुआ। उन्होंने जानकारी दी कि लक्ष्य के अनुपात में 46 फीसदी धान बीज का उठाव ही लैम्प्स ने किया। कृषि पदाधिकारी ने बताया कि जितने धान बीज का उठाव किया गया था, उसका 95 फीसदी वितरित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जहां कहीं भी कमी रह गई होगी, उसे दूर कर लिया जायेगा।

झारखंड में एक बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है
गौरतलब है कि झारखंड एक कृषि प्रधान राज्य है। प्रदेश की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी, आजीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर है। राज्य सरकार ने बिरसा हरित ग्राम योजना और जेएसएलपीएस के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए हैं। हालांकि, अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है। यदि खेती किसानी की स्थिति बढ़िया होगी तो पलायन रुकेगा और झारखंड की भी आय बढ़ेगी।