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2007 में बची थी दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जान, आज भी इस हादसे को याद करते हैं लोग

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द फॉलोअप डेस्क
झारखंड की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और करिश्माई नेताओं में शुमार दिशोम गुरु शिबू सोरेन का 81 वर्ष की उम्र में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। राज्य भर में शोक की लहर है। उनके पुत्र और राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस दुखद समाचार की पुष्टि की। शिबू सोरेन सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक आंदोलनकारी नेता, एक विचारधारा, और आदिवासियों की बुलंद आवाज थे।

शिबू सोरेन पर एक बार जानलेवा हमला भी हो चुका है। 25 जून 2007 को जब उन्हें झारखंड के दुमका जेल ले जाया जा रहा था, तब उनके काफिले पर बम से हमला किया गया था। यह हमला सुनियोजित था, लेकिन सौभाग्यवश इसमें कोई हताहत नहीं हुआ। उस समय वह बाल-बाल बचे, लेकिन यह घटना उनके जीवन की असाधारण संघर्षपूर्ण यात्रा का एक और उदाहरण बन गई।

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन भी काफी उथल-पुथल भरा रहा। 2004 में जब वह केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में कोयला मंत्री बने थे, तभी उनके खिलाफ 30 साल पुराने एक मामले में गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। मामला था 1975 के चिरूडीह नरसंहार का, जिसके बाद उन्हें अंडरग्राउंड होना पड़ा। उस वक्त पूरे देश में राजनीतिक भूचाल आ गया।
बता दें कि 1975 में दुमका जिले के चिरूडीह गांव में एक भीषण हिंसा हुई थी, जिसे "चिरूडीह नरसंहार" कहा गया। शिबू सोरेन का दावा था कि वह आदिवासियों की जमीन को वापस दिलाने के लिए आंदोलन चला रहे थे। उसी दौरान एक दिन आदिवासी तीर-कमान लेकर और महाजन पक्ष बंदूकें लेकर आमने-सामने आ गए। नतीजा हिंसक झड़प हुई, जिसमें 9 मुस्लिम समेत 11 लोग मारे गए। इस घटना के बाद शिबू सोरेन के खिलाफ हत्या का मुकदमा चला। लेकिन आदिवासी समाज में वह नायक बनकर उभरे। उनके समर्थन में जनसैलाब उमड़ पड़ा। अंततः कोर्ट से उन्हें राहत मिली और मनमोहन सिंह ने दोबारा उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया।
शिबू सोरेन को देश भर में आदिवासियों की आवाज के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने 1970 के दशक में 'धनकटनी आंदोलन' और अन्य कई सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वे बिहार से अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर चले लंबे संघर्ष के प्रमुख चेहरे रहे। शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य बनने के बाद तीन बार मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया 2005, 2008 और 2009 में। हालांकि उनकी सरकारें अधिक समय तक नहीं चलीं, लेकिन उनके कार्यकाल ने झारखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया।

शिबू सोरेन ने पहली बार 1977 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन हार का सामना करना पड़ा था. उसके बाद हुए 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्हें सफलता मिली. इसके बाद 1986, 1989, 1991, 1996 में भी वो चुनाव जीते थे. 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिए चुने गए थे। शिबू सोरेन का निधन केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि यह झारखंड आंदोलन के एक युग का अंत है। उन्होंने जिस तरह से आदिवासियों के हक के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित की, वह हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उनका जाना, आदिवासी समाज, झारखंड और भारतीय राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है।



 

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