जामताड़ा
माथे पर सिंदूर, आंखों में आंसू और हाथ जोड़कर सरकार से अपने पति की जान की भीख मांगती करिश्मा देवी की तस्वीर देखकर आपकी आंखों में भी नमी आ जाएगी। दरअसल, करिश्मा देवी का 10 साल का बेटा भी मुख्यमंत्री से अपने पिता को बचाने की गुहार लगा रहा है। जामताड़ा प्रखंड की बरजोरा पंचायत के बरजोरा गांव की यह तस्वीर है। गांव के 33 वर्षीय दुर्योधन मंडल मलाशय (रेक्टम) के कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, उनके पास अब केवल दो महीने का समय बचा है। ऑपरेशन के लिए 3 लाख रुपये की सख्त जरूरत है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण इलाज रुका हुआ है। आइए इसे पूरे अच्छे से जानते है...........
बीमारी का पता चला, पर खत्म हो गई जमा-पूंजी
दुर्योधन के अनुसार, फरवरी 2026 में उन्हें शौच के दौरान तकलीफ शुरू हुई। स्थानीय निजी क्लिनिक में ट्यूमर बताया गया, लेकिन जब तकलीफ बढ़ी और वे एम्स देवघर पहुंचे, तो जांच में प्रथम स्टेज के कैंसर की पुष्टि हुई। इसके बाद वे इलाज के लिए कोलकाता चले गए, जहां डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी और 3 लाख रुपये का खर्च बताया। दुर्योधन अब तक लोगों से कर्ज मांगकर करीब 2 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। फिलहाल उनका रेडिएशन उपचार चल रहा है। कुल 30 में से 24 रेडिएशन पूरे हो चुके हैं। आयुष्मान भारत योजना से रेडिएशन की सुविधा तो मिल रही है, लेकिन ऑपरेशन और अन्य दवाओं का भारी खर्च उठाना परिवार के बस से बाहर हो चुका है।.jpeg)
दाने-दाने को तरस रहा 6 सदस्यों का परिवार
दुर्योधन पहले एक मिठाई की दुकान में काम करके हर महीने 9 हजार रुपये कमा लेते थे। लेकिन पिछले 5 महीनों से बीमारी और पैसों के इंतजाम में दर-दर भटकने के कारण काम पूरी तरह छूट चुका है। परिवार में वे, उनकी पत्नी करिश्मा देवी, 10 साल का बेटा, विधवा बहन और उसके दो छोटे बच्चे शामिल हैं। सरकारी कोटे से मिलने वाला 14 किलो चावल पूरे महीने के लिए नाकाफी है, जबकि परिवार को हर महीने कम से कम 30 किलो चावल की जरूरत होती है। वर्तमान में पूरा परिवार एक टूटे-फूटे मिट्टी के मकान में जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहा है। करिश्मा देवी बताती हैं, "बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन उनके पास कॉपी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। जब दूसरे बच्चे जेब खर्च के लिए 10 रुपये लेकर जाते हैं, तो मेरा बेटा शर्म और झिझक के मारे स्कूल जाने से कतराता है।.jpeg)
सरकार और प्रशासन से मदद की गुहार
दुर्योधन कहते हैं कि ससुराल पक्ष और भाई-बहन कभी-कभार थोड़ी मदद कर देते हैं, लेकिन यह सहारा कब तक चलेगा? अगर सरकार और जिला प्रशासन उनके इलाज का खर्च वहन कर ले, तो वे ठीक होकर फिर से मेहनत-मजदूरी करेंगे और अपने परिवार का पेट पाल सकेंगे। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन और समाज के भामाशाह इस बेबस परिवार की पुकार सुनकर वक्त रहते मदद के लिए आगे आते हैं या नहीं।