द फॉलोअप डेस्क
पलामू जिले के पाटन प्रखंड के नावाजयपुर थाना क्षेत्र स्थित नावाखास पंचायत में एक अवैध क्लीनिक के भंडाफोड़ ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिंदा बैंक्वेट हॉल के बेसमेंट में वर्षों से संचालित इस क्लीनिक को प्रशासन ने छापेमारी कर सील कर दिया, लेकिन इस दौरान सामने आए तथ्यों ने पलामू स्वास्थ्य विभाग और सिविल सर्जन कार्यालय की भूमिका को कटघरे में ला खड़ा किया है। प्रखंड विकास पदाधिकारी सह अंचल अधिकारी अमित कुमार झा के नेतृत्व में हुई कार्रवाई के दौरान यह खुलासा हुआ कि पंडवा निवासी सेवक मेहता बिना किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा डिग्री के खुद को डॉक्टर बताकर लंबे समय से क्लीनिक चला रहा था। जांच के क्रम में यह भी पाया गया की परिसर में एक पूरी तरह संचालित प्रसव कक्ष और ऑपरेशन थिएटर मिला, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि यहां नियमित रूप से अवैध सर्जरी और प्रसव कराए जा रहे थे।

जांच के दौरान बड़ी मात्रा में एलोपैथिक दवाएं और कुछ प्रतिबंधित दवाएं भी बरामद की गईं, जबकि क्लीनिक के बाहर आयुर्वेदिक संस्थान का बोर्ड लगा हुआ था। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि मरीजों को गुमराह करने का भी गंभीर मामला है। मौके से गर्भवती महिलाओं की कई अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट भी मिली हैं, जो इस बात की पुष्टि करती हैं कि यहां संवेदनशील चिकित्सा सेवाएं दी जा रही थीं। इस पूरे मामले ने सबसे बड़ा सवाल पलामू स्वास्थ्य विभाग और सिविल सर्जन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर खड़ा कर दिया है। एक अवैध क्लीनिक, वह भी ऑपरेशन थिएटर और प्रसव कक्ष के साथ, वर्षों तक कैसे संचालित होता रहा और संबंधित विभाग को इसकी जानकारी तक नहीं मिली। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में इस क्लीनिक की गतिविधियां किसी से छिपी नहीं थीं, इसके बावजूद कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

इससे विभागीय लापरवाही या संभावित मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। घटना के बाद क्षेत्र में यह मांग तेज हो गई है कि राज्य सरकार और स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करें। लोगों का कहना है कि जिले में चल रहे सभी अवैध क्लीनिकों की व्यापक जांच हो साथ ही दोषी अधिकारियों और कर्मियों की जवाबदेही तय की जाए, फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, गौरतलब है कि पलामू उपायुक्त समीरा एस के निर्देश पर जिले में अवैध क्लीनिकों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि जमीनी स्तर पर निगरानी व्यवस्था कमजोर है। नावाजयपुर का यह मामला सिर्फ एक अवैध क्लीनिक का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों के कारण कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।