द फॉलोअप डेस्क
झारखंड में अब पंचायतें जलवायु परिवर्तन संकट से लड़ने के लिए सक्रिय हो रही हैं। बुधवार को Policy & Development Advisory Group (PDAG), असर और पंच सफर की ओर से सम्मेलन (कॉन्फ्रेंस ऑफ पंचायत) का आयोजन हुआ। इसमें उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के बोकारो, रामगढ़, हजारीबाग, धनबाद, गिरिडीह, चतरा और कोडरमा जिलों से करीब 80 पंचायती राज संस्थान (PRI) प्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा थे, जबकि विशिष्ट अतिथि बोकारो के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर रजनीश कुमार थे।
उपायुक्त अजय नाथ झा ने पंचायत प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे आने वाले तीन वर्षों के लिए एक व्यापक योजना बनाएं और अगले वर्ष इसका कार्यान्वयन शुरू करें, विशेष रूप से इंडस्ट्री प्रभावित इलाकों में जलवायु सततता पर जोर देते हुए प्रशासन द्वारा पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि “विश्व का अस्तित्व खतरे में है, इसलिए सस्टेनेबिलिटी की नींव गांवों से ही मजबूत होगी।”
डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर रजनीश कुमार ने कहा कि जलवायु समस्या ग्लोबल है, लेकिन समाधान लोकल स्तर पर ही प्रभावी होगा। पंचायती राज संस्थाओं को ग्रामस्तर की स्थानीय समझ का उपयोग करके क्लाइमेट नीति बनाने और कॉमन्स संरक्षण के मॉडल तैयार करने की आवश्यकता है।
हजारीबाग जिले की चुरचू प्रखंड की चरही पूर्वी पंचायत समिति सदस्य आशा राय ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर गांवों में स्पष्ट दिख रहा है, जैसे चूड़ी नदी का सूखना और मानव–वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि। सम्मेलन में उन्हें जलवायु-अनुकूल पंचायत नीति और फंड लाने की समझ विकसित हुई।
पंच सफर के निदेशक गुलाब चंद्र ने बताया कि ऐसा सम्मेलन पंचायतों को सामुदायिक संसाधन विकास और आजीविका सुरक्षा का मंच बनेगा, साथ ही जलवायु वित्त (Climate Finance) समझ विकसित करने में मदद करेगा।
कॉन्फ्रेंस में बोकारो जिले में बेरमो व गोमिया प्रखंडों में दो क्लस्टर बनाए गए, जिनमें छह-छह पंचायतें शामिल हैं। कार्यक्रम में यह बात प्रमुख रूप से उठी कि PRI सतत ग्रामीण विकास, जलवायु खतरे से निपटने और आर्थिक उन्नति के लिए जलवायु वित्त कैसे प्राप्त और प्रबंधित कर सकती है।
सम्मेलन में प्रमुख चर्चाएं इस प्रकार थीं
जलवायु वित्त तंत्र (जैसे NAFCC, CAMPA) की जानकारी व लाभ उठाने के मार्ग
पंचायत स्तर पर अभियान योजना तैयार करना
कॉमन्स शासन: सामुदायिक जंगल, चारागाह व जल स्रोतों का संरक्षण
पारंपरिक ज्ञान को स्थानीय जलवायु नीति में शामिल करना
भूमि क्षरण रोकने व पारिस्थितिकी आधारित अनुकूलन
कॉमन्स संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए बताया गया कि यह 35 करोड़ से अधिक ग्रामीणों की आजीविका से जुड़ा है, परन्तु यह हर साल करीब 4% की दर से सिकुड़ रहा है। इसकी वजह प्रशासकीय विफलता, संस्थागत कमजोरी और वित्तीय समन्वय की कमी बताई गई। कॉन्फ्रेंस में स्थानीय पंचायती राज प्रतिनिधियों द्वारा तकनीकी क्षमता, वित्तीय बाधाओं और प्रक्रिया की समझ में उठते सवालों पर खुलकर विचार-विमर्श हुआ, ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने की ग्राम-स्तरीय क्षमता सुदृढ़ हो सके।
