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नहले पर दहला : असम विधानसभा चुनाव से पहले टी ट्राइब्स को भूमि आवंटन की प्रक्रिया शुरू

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द फॉलोअप डेस्क

असम में टी ट्राइब्स को लेकर जारी राजनीति के बीच आज एक नया मोड़ आ गया है। पिछले दिनों झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन असम में आदिवासी महासभा को संबोधित किया था। उसमें असम में रह रहे टी ट्राइब्स और अन्य राज्यों के आदिवासियों की समस्याओं पर विशेष फोकस किया था। साथ ही उन्होंने इनसे अपनी मांगों की पूर्ति के लिए एकजुट होने का आह्वान किया था। हेमंत सोरेन का यह कार्यक्रम और उनका भाषण भी चुनावी था। अब असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने आज चाय बगानों में वर्षों से रह रहे टी ट्राइब्स और अन्य मजदूरों को भूमि आवंटन की प्रक्रिया प्रारंभ कर नहले पर दहले का खेल खेला है। बिस्व सरमा ने सोमवार को डिब्रुगढ़ के दिनजॉय चाय बगान में वहां कार्यरत टी ट्राइब्स व अन्य मजदूरों के बीच भूमि बंदोबस्ती के लिए आवेदन पत्रों का वितरण किया। सरकार पहले चरण में 103 चाय बगानों के मजदूरों को भूमि का मालिकाना हक देगी। मालिकाना हक मिलने पर चाय बगान के मजदूर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बगैर बगान प्रबंधन की स्वीकृति से अपने लिए घर बना सकेंगे। असम सरकार की कोशिश है कि अप्रैल-मई में संभावित विधानसभा चुनाव से पूर्व चाय बगानों के मजदूरों को भूमि का मालिकाना हक दे दिया जाए।

असम की सरकार ने चाय बगानों में कार्यरत टी ट्राइब्स और अन्य मजदूरों को भूमि का मालिका हक देने के लिए पहले ही फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स (संशोधन) विधेयक 2025 पास करा चुकी है। इस अधिनियम के तहत चाय बगानों की श्रमिक बस्तियों की भूमि को बगान प्रबंधन से सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। ताकि उस भूमि का आवंटन श्रमिकों के बीच किया जा सके। यहां मालूम हो कि असम में लगभग 825 चाय बगान हैं। इसमें 3.33 लाख श्रमिक परिवार कार्यरत हैं। इनकी संख्या लगभग 14 लाख के करीब है। भूमि आवंटन से 14 लाख टी ट्राइब्स और अन्य श्रमिकों के लाभान्वित होने की संभावना है। शर्त है कि जमीन का आवंटन होने के बाद उसे 20 वर्षों तक बेचा नहीं जा सकेगा। उसके बाद भी सीएनटी की तर्ज पर उस जमीन की बिक्री टी ट्राइब्स के बीच ही होगी।

ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की कोशिश

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा टी ट्राइब्स के बीच भूमि आवंटन और उसका मालिकाना हक दिए जाने को ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की दिशा में राज्य सरकार का बड़ा कदम बता रहे हैं। मालूम हो कि आजादी से वर्षों पूर्व अंग्रेज असम के चाय बगानों में काम करने के लिए झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल सहित देश के अन्य राज्यों से श्रमिकों को वहां ले गए। झारखंड या छत्तीसगढ़ में एसटी का दर्जा प्राप्त चाय बगानों में काम करने वाले मजदूर वहां अनारक्षित श्रेणी में हो गए। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने उन्हें ओबीसी का दर्जा दिया। लेकिन ये लंबे समय से एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं। साथ ही जमीन पर मालिकाना हक की भी मांग करते आ रहे हैं। इसको लेकर असम में आंदोलन भी होते रहे हैं।

एसटी का दर्जा देने की भी सरकार कर चुकी है पहल

नवंबर 2025 में असम की सरकार ने कुछ समुदायों को एसटी का दर्जा देने के लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया था। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स ने छह समुदाय को एसटी का दर्जा देने की सिफारिश की थी। उसमें टी ट्राइब्स, ताई अहोमस कोच-राजबोंगशी, चूतिया, मटक और मोरन शामिल है। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की सिफारिश को वहां की कैबिनेट ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति की सहमति के बाद इन समुदायों को एसटी का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। उम्मीद की जा रही है असम विधानसभा चुनाव से पूर्व केंद्र की भाजपा सरकार एसटी का दर्जा देने की भी स्वीकृति प्रदान कर देगी।

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