द फॉलोअप डेस्क, रांचीः
1970 के दशक में शिबू सोरेन जंगलों मे आदिवासियों को महाजनी प्रथा और शोषण के खिलाफ संगठित कर रहे थे। धनकटनी आंदोलन चल रहा था। पुलिस को शिकायतें मिल रही थी और इसी सिलसिले में पुलिसकर्मी अक्सर उन्हें ढूंढ़ने घर पहुंचती थी। बार-बार की पूछताछ से परेशान होकर एक दिन रूपी सोरेन ने पुलिसवालों से कह दिया कि यह रूपी सोरेन का घर है। शिबू सोरेन यहां नहीं हैं, कहीं और जाकर ढूंढ़िए। उस समय टुंडी और आसपास के इलाकों में शिबू सोरेन का ठिकाना हुआ करता था। एक समय ऐसा भी आया जब लंबे वक्त तक शिबू सोरेन से संपर्क नहीं हो सका। तब रूपी सोरेन ने खुद जंगल जाकर उन्हें ढूंढ़ने का फैसला किया। उन्होंने अपनी सास और ननद को साथ लिया और शिशु दुर्गा सोरेन को गोद में लेकर जंगल चली गईं। तीनों जंगल में भटकती रहीं।

झारखंड राज्य आंदोलन में रूपी सोरेन का संघर्ष भी बराबर
आखिरकार, जब पति से मुलाकात हो पाई तब जाकर उन्होंने राहत की सांस ली। पहले महाजनी-साहूकारी व्यवस्था के खिलाफ धनकटनी आंदोलन और बाद में अलग झारखंड राज्य के लिए संघर्ष के दौरान शिबू सोरेन की व्यस्तता के बीच वह रूपी सोरेन ही थीं, जिन्होंने परिवार को संभाला। यही वजह है कि जानने वाले कहते हैं कि अलग झारखंड राज्य आंदोलन में रूपी सोरेन का संघर्ष भी बराबर था।

संघर्ष के दिनों में रूपी सोरेन ने परिवार संभाला
अलग झारखंड राज्य आंदोलन और महाजनी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के दिनों में शिबू सोरेन को अक्सर छिपकर रहना पड़ता था। धनबाद के टुंडी और गिरिडीह के पीरटांड़ इलाके में शिबू सोरेन आदिवासियों को सामाजिक और राजनीतिक तौर पर संगठित करने में लगे थे रूपी सोरेन ने कई दफा यह बताया कि संघर्ष के दिनों में उन्होंने बच्चों को पाला, घर संभाला और शिबू सोरेन को आश्वस्त किया कि वे सामाजिक-राजनीतिक कार्यों में सक्रिय रह सकते हैं। बाद के वर्षों में बोकारो स्टील सिटी के सेक्टर 1-सी स्थित क्वार्टर में शिबू सोरेन पत्नी रूपी सोरेन, दिवंगत बेटे दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और बेटी अंजलि के साथ रहा करते थे।