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संघर्ष से सफलता तक: जामताड़ा की चंपा पाल बनीं नेशनल ट्रेनर, हजारों महिलाओं को कर रही आत्मनिर्भर

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द फॉलोअप डेस्क 

जब हिम्मत और जज़्बा साथ मिलते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। जामताड़ा जिले की चंपा पाल आज महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं। आर्थिक तंगी, कम उम्र में विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबने वाली चंपा ने आज सरकारी तौर पर नेशनल ट्रेनर के रूप में अपनी पहचान बना ली है। मिहिजाम थाना क्षेत्र के बेवा गांव की चंपा की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। कम उम्र में शादी के बाद उनके सामने कई चुनौतियाँ थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी किस्मत बदलने के लिए चंपा ने साल 2015 में आरएसईटीआई (RSETI) प्रशिक्षण संस्थान में कदम रखा। यहाँ उन्होंने सिलाई-कटाई और अन्य हुनरों का 21 दिनों का निशुल्क प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के बाद चंपा ने अपनी मेहनत और पैसों से एक सिलाई मशीन खरीदी और घर से काम शुरू किया। जल्दी ही वह फैंसी कपड़े और सूट-साड़ी सिलकर महीने के 15-16 हजार रुपये कमाने लगीं। उनकी मेहनत और हुनर को देखते हुए आरएसईटीआई ने उन्हें ट्रेनर के रूप में नियुक्त किया।

आज चंपा नेशनल गवर्नमेंट ट्रेनर बन चुकी हैं और झारखंड एवं बिहार में अब तक 3,000 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी हैं, जिनमें से करीब 800 महिलाएं अकेले जामताड़ा जिले की हैं। चंपा बताती हैं कि उन्हें सरकार की ओर से प्रशिक्षण देने के लिए हर महीने 32,000 रुपये का मानदेय मिलता है। इसके अलावा, परीक्षा लेने के दौरान उन्हें 2,500 रुपये प्रतिदिन का भत्ता भी मिलता है। इतने व्यस्त होने के बावजूद वह घर पर सिलाई का काम जारी रखती हैं, जिससे उनकी अतिरिक्त आय भी होती है। चंपा की प्रेरणा से गांव की अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनने लगी हैं। सोनाली मंडल, जो चंपा से ट्रेनिंग ले चुकी हैं, बताती हैं कि उन्होंने 'मंईयां सम्मान योजना' से मिली राशि से सिलाई मशीन खरीदी और अब अपनी दुकान चला रही हैं, परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं। आरएसईटीआई के वरिष्ठ फेकल्टी सुमित कुमार के अनुसार, ग्रामीण विकास मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा संचालित इस कार्यक्रम के तहत लोगों को हुनर सिखाकर स्वरोजगार से जोड़ा जाता है, और चंपा पाल इस मिशन की सबसे सफल कड़ी बनकर उभरी हैं।

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