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"पादरी-पास्टर का इस गांव में आना सख्त मना है", लोहरदगा के हाटी गांव में क्यों लगा दिया ऐसा बोर्ड!

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भंडरा/लोहरदगा:

इस गांव में ईसाई पादरी और पास्टर का प्रवेश करना मना है। ग्राम सभा ने यह लिखकर गांव के प्रवेश द्वार पर बोर्ड लगा दिया है। तस्वीरें लोहरदगा के भंडरा प्रखंड अंतर्गत आदिवासी बहुल गांव हाटी की है। पिछले दिनों 7 आदिवासी परिवारों के ईसाई धर्म छोड़कर घर वापसी को लेकर चर्चा में रहा हाटी गांव अब नई वजह से सुर्खियों में है। झारखंड के आदिवासी बहुल गांवों में ऐसे बोर्ड नए नहीं हैं, लेकिन नये बोर्ड के साथ एक बुनियादी फर्क है। पहले 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को लिखकर बोर्ड लगाया गया है और अब लोहरदगा के एक गांव में पादरी और पास्टर के प्रवेश निषेध वाला बोर्ड लगा है। पूरे मामले को सिलसिलेवार ढंग से समझेंगे, सबसे पहले इस बोर्ड में लिखी सामग्री को पढ़ते हैं। 

 

ग्राम सभा द्वारा लगाए गये बोर्ड में क्या लिखा है!
इस बोर्ड में लिखा है कि पादरी-पास्टर का प्रवेश सख्त मना है। लिखा है ग्राम हाटी, थाना भंडरा, जिला लोहरदगा, झारखंड, भारत के संविधान की 5वीं अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हमारे ग्राम हाटी में पेसा अधिनियिम, जिसके अंतर्गत ग्राम सभा को अपनी परंपरा और रुढ़िवादी संस्कृति का संरक्षण करने का अधिकार है, लागू है। अत हम ग्राम सभा के प्रस्ताव के आधार पर हमारे ग्राम हाटी में ईसाई धर्म के पास्टर और पादरी के प्रवेश पर रोक लगाते हैं। बाहर से आने वाले धर्मांतरित व्यक्तियों का भी गांव में  आना मना है। हम ईसाई धर्म के किसी भी प्रार्थना प्रयोजन और धार्मिक आयोजन पर रोक लगाते हैं।

लोहरदगा के हाटी गांव में ग्राम सभा की ओर से उठाया गया यह कदम झारखंड में सरना, धर्मांतरण और आदिवासी अधिकारों पर नई बहस को जन्म देगा। 

ईसाई धर्म-प्रचारकों का गांव में किया प्रवेश निषेध
गौरतलब है कि हाटी गांव में आदिवासी संगठनों और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर ग्राम सभा ने गांव में ईसाई धर्म के पास्टर और पादरियों के प्रवेश पर न केवल रोक लगाई, बल्कि यह भी ऐलान किया है कि गांव की परिधि में किसी भी ईसाई प्रार्थना सभा अथवा धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं होने दिया जायेगा। ग्राम सभा का तर्क है कि ईसाई धर्म प्रचारक शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास समेत अन्य सुविधाओं का लालच देकर गरीब आदिवासियों का धर्मांतरण कराते हैं। इनका कहना है कि हमें धर्म प्रचार से शिकायत नहीं है, लेकिन हमारे ही गांव में आकर हमारे धर्म और ईश्वर को नीचा दिखाकर हमारे लोगों के धर्मांतरण की इजाजत नहीं दी जायेगी। 

आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने किया नेतृत्व
हाटी गांव में इस विशेष ग्राम सभा का नेतृत्व भारतीय राजस्व सेवा की अधिकारी निशा उरांव ने किया। ग्राम सभा में सामाजिक कार्यकर्ता सन्नी टोप्पो समेत विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि शरीक हुये। इन्होंने कहा कि संविधान की 5वीं अनुसूची और पेसा कानून हम आदिवासियों को अपनी धर्म, संस्कृति, भाषा और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का अधिकार देता है। हमने इसी अधिकार का इस्तेमाल करके गांव में बोर्ड लगाया है। वक्ताओं का तर्क था कि ईसाई धर्म प्रचारकों की गतिविधियों ने आदिवासी समाज की मूल पहचान को खतरे में डाल दिया है। समय आ गया है कि हम अपनी पहचान को मिटाने से बचाने के लिए सख्त कदम उठाएं। 

गांव के प्रत्येक कोने में बोर्ड लगाएगी ग्राम सभा
ग्राम सभा ने तय किया है कि हाटी गांव के चारों कोनों पर ऐसा ही बोर्ड लगाया जायेगा। सामाजिक कार्यकर्ता सन्नी टोप्पो ने इसे वृहद जनजागरण की शुरुआत कहा। उन्होंने कहा कि लालच पर आधारित धर्मांतरण के खिलाफ एक मुहिम शुरू होना ही था। अच्छा है कि शुरुआत हाटी गांव से हुई, क्योंकि हाल ही में यहां 7 आदिवासी परिवारों की घर वापसी हुई है। उन्हें धर्म प्रचार  का अधिकार है तो हमें भी धर्म बचाने का अधिकार है। 

झारखंड में धर्मांतरण के खिलाफ किसी गांव का पहला कदम
झारखंड में कथित धर्मांतरण के मुद्दे पर किसी गांव की ग्राम सभा ने पहली बार ऐसा कोई कदम उठाया है। हो सकता है कि इसपर प्रतिक्रिया भी आये। फिलहाल हाटी गांव की ग्राम सभा और आदिवासी संगठनों का ऐसा तर्क है कि उनका कदम किसी धर्म के खिलाफ नहीं अपितु, अपनी सदियों पुरानी सरना संस्कृति, धर्म, भाषा और अस्तित्व को बचाने का आत्मरक्षा वाला कदम है। इनका कहना है कि झारखंड के विभिन्न गांवों में ऐसा ही बोर्ड लगाया जायेगा, जहां भी प्रलोभन देकर आदिवासियों का धर्मांतरण कराया जा रहा है। 

झारखंड में आदिवासी डेमोग्राफी में बदलाव का कारण क्या!
गौरतलब है कि झारखंड में धर्मांतरण की वजह से आदिवासी पहचान को खतरा पर चर्चा नई नहीं है। पिछले काफी समय से  आदिवासी बहुल इलाकों में डेमोग्राफी में बदलाव का जिम्मेदार धर्मांतरण को बताया जा रहा है। कोल्हान से लेकर संताल परगना तक आदिवासी अस्तित्व और जल-जंगल-जमीन की रक्षा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है। राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों के बीच इस विषय पर काफी खींचतान है।

अब हाटी गांव में लगा यह बोर्ड आदिवासी, धर्मांतरण और इसमें ईसाई मिशनरियों की भूमिका पर नई बहस को जन्म देगा। कोई इसे आदिवासियों में उठा जनजागरण बता रहा है तो कोई हिडेन एजेंडा। सच, इन्हीं के बीच कहीं है...

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