logo

विष्णु मुंडा ने एक हाथ से लिखी अपनी सफलता की कहानी, JPSC पास कर बने JAS अधिकारी

vikas_munda_viklang_jpsc.jpg

द फॉलोअप डेस्क
झारखंड की मिट्टी ने एक और बेमिसाल कहानी को जन्म दिया है। विष्णु मुंडा एक ऐसा नाम जो न सिर्फ प्रशासनिक सेवा की नई पहचान बना, बल्कि लाखों युवाओं को यह सीख भी दे गया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शारीरिक, सामाजिक या आर्थिक बाधा रास्ते की दीवार नहीं बन सकती। विष्णु ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) परीक्षा में 282वीं रैंक हासिल कर झारखंड प्रशासनिक सेवा (JAS) में चयन पाया है। लेकिन उनकी ये सफलता एक सीधी राह से नहीं, बल्कि कांटों और संघर्षों से होकर निकली है।
विष्णु मुंडा रांची के तमाड़ ब्लॉक के नूरीडीह गांव के आदिवासी समुदाय से आते हैं, चकाचौंध से दूर, एक साधारण परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता गोवर्धन मुंडा दिन में दिहाड़ी मजदूरी करते थे और रात में रेलवे अधिकारियों के रेजिडेंस में नाइट गार्ड की ड्यूटी करते थे। मां एक साधारण गृहिणी हैं और बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। विष्णु के बड़े भाई गाडवीन मुंडा ने खुद की पढ़ाई बीच में छोड़ दी ताकि अपने छोटे भाई विष्णु की पढ़ाई का खर्च उठा सकें। उन्होंने एक निजी संस्था में छोटी सी नौकरी कर ली, लेकिन भाई की पढ़ाई नहीं रुकने दी।

शारीरिक रूप से विष्णु बचपन से ही विकलांग हैं। उनका एक हाथ नहीं है, लेकिन इस "कमी" को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पढ़ाई के साथ-साथ विष्णु एक शानदार क्रिकेट खिलाड़ी भी रहे हैं। वह हजारीबाग के जाने-माने ऑलराउंडर माने जाते थे, गेंदबाजी, फील्डिंग और कैचिंग में इतने निपुण कि विरोधी टीमें यह कभी नहीं अह्सास कर पाएं कि विष्णु का दाहिना हाथ नहीं है।
JPSC में विष्णु का यह पहला प्रयास नहीं था। इससे पहले उन्होंने परीक्षा दी थी लेकिन मेन्स में सफल नहीं हो सके। कई लोग जहां पहले प्रयास की असफलता के बाद पीछे हट जाते हैं, वहीं विष्णु ने इसे एक सीख की तरह लिया और अपनी कमियों पर काम करते हुए दोबारा मैदान में उतरे। इस बार उन्होंने अपने आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के बल पर वह मुकाम हासिल किया जिसे पाना उनके जैसे हजारों युवाओं का सपना होता है।

विष्णु ने कभी महंगी कोचिंग का सहारा नहीं लिया। संसाधनों की कमी हमेशा बनी रही, लेकिन उन्होंने उसे कभी बहाना नहीं बनने दिया। खुद पढ़ाई की, ट्यूशन पढ़ाया, नोट्स खुद बनाए और इंटरनेट पर उपलब्ध सीमित साधनों से खुद को तैयार किया। कहते हैं न अगर चाह हो तो राह निकल ही आती है। विष्णु ने उसी राह पर चलकर जीत की इबारत लिख दी।
आज जब विष्णु JAS जैसे बड़े पद पर पहुंचे हैं तो उनकी आंखों में गर्व और माता-पिता की आंखों में आंसू हैं ,आभार और खुशी के। विष्णु भावुक होकर कहते हैं, “अगर मेरे माता-पिता ने भूखे रहकर, रात में जागकर और हर मुश्किल सहकर मेरा साथ नहीं दिया होता, तो शायद मैं आज यहां तक नहीं पहुंच पाता। मेरी सफलता उनकी तपस्या का फल है।”

विष्णु आगे कहते हैं, "मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे दिव्यांग, गरीब और आदिवासी बच्चे कभी हार न मानें। संघर्ष जीवन का हिस्सा है, लेकिन मेहनत से हर अंधेरे को उजाले में बदला जा सकता है। जो लोग सोचते हैं कि वे नहीं कर सकते, मैं उन्हें अपनी कहानी सुनाना चाहता हूं।”
विष्णु की सफलता केवल एक व्यक्ति की नहीं है, यह उस वर्ग की जीत है जिसे अक्सर समाज की मुख्यधारा से दूर समझा जाता है। यह जीत है उन माता-पिता की तपस्या की, जो अपनी संतानों के लिए खुद की नींद, भूख और आराम छोड़ देते हैं। और यह जीत है उस युवा की, जो समाज की बनाई सीमाओं को तोड़कर खुद की दुनिया बनाता है। विष्णु की ये कहानी आज की पीढ़ी के लिए सिर्फ एक प्रेरणा नहीं, बल्कि जीती-जागती उम्मीद है कि हालात चाहे जैसे भी हों, “अगर एक हाथ नहीं है, तो क्या हुआ एक सपना पूरा करने के लिए एक दिल काफी है।

 

Tags - latest jharkhand news jharkhand News JPSC News Updates latest JPSC news updates latest jharkhand News jharkhand Updates latest jharkhand news jharkhand Updates in hindi jharkhand latest news