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सत्ता और सचिवालय का सच : कोऊ नृप होऊ हमें का हानि

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जीतेंद्र कुमार
रामायण की बहुचर्चित लाईन है। कोऊ नृप होऊ हमें का हानि। जी हां, यहां भी एक बड़े साहब का यही मानना है। इससे उनके कैडर के अन्य वरीय- कनीय साहब  बहुत जलते भी हैं। ईर्ष्या भी करते हैं। पूरे खोज-बीन में जुटे रहते हैं कि साहब में वह कौन सा गुण है, जो एक ही जगह वर्षों से जमें हैं। सड़क बनवाते ही जा रहे हैं। पूर्व की सरकार थी, उसमें भी वह सड़क बनवाते थे, आज भी सड़क बनवा रहे हैं। बीच बीच में बिल्डिंग भी बनवाने लगते हैं। अभी सड़क को शहरों से जोड़ने का भी काम कर रहे हैं। राज्य के शहरों को सुंदर बनाने में जी-जान लगा बैठे हैं। उनके कैडर के लोग जोड़-घटाव, गुणा-भाग करते हैं। पदस्थापन का समय जोड़ते जाते हैं। पता चलता है कि साहब ने झारखंड में सड़क बनवाने का रिकार्ड कायम कर चुके हैं। इतने दिनों तक वर्क्स में रहने का कैलिवर उनके कैडर के किसी अन्य अधिकारी में नहीं रहा है। झारखंड में वह रिकार्ड स्थापित कर चुके हैं, अब शायद देश के किसी अन्य राज्य के रिकार्ड को तोड़ने वाले हैं।


देखिए साहब में गुण तो है। मैनेजेरियल कैलिवर भी है। नहीं तो किसी को पक्ष और विपक्ष का बराबर का आशीर्वाद कहां किसको मिलता। ऐसे साहब बहुत बिरले पाये जाते हैं। कुछ कारण हुआ तो पिछली बार लाल बाबू जी ने सभा में साहब पर सवाल खड़ा कर दिया। कई माननीय भौंचक्के रह गए। बताते हैं कि साहब भी परेशान हो उठे। उस समय साहब भी सभा में ही बैठे थे। परेशान हो उठे। बेचैन हो उठे। कुछ दिनों तक काफी तनाव में भी रहे। फिर अपने कारिदों को कायदे से लगाया। समय रहते साहब ने सब कुछ मैनेज कर लिया। जी हां, साहब का यह मैनेजेरियल पावर अब सत्ता के गलियारे की चर्चा बनी रहती है। लोग उनके इस गुण को जानने में लगे रहते हैं। उस पर चलने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन फिर एक कहावत चरितार्थ होती है-कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, दुनिया चाहे कितना भी कोसे, चलती रहेगी हमारी गाड़ी। 

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