द फॉलोअप डेस्क
लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा प्रदान किये जाने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में हुई हिंसा में 4 लोगों की मौत के बाद प्रशासन ने कड़ा एक्शन लिया है। जाने माने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शुक्रवार यानि 26 सितंबर को लेह से गिरफ्तार कर लिया गया है और उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया है। गिरफ्तारी के तुरंत बाद, उन्हें लद्दाख से राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया है, जहाँ उन्हें हाई-सिक्योरिटी वार्ड में 24 घंटे सीसीटीवी की निगरानी में रखा गया है।
अब इसकी पूरी कहानी क्या है, आइये समझते हैं:
लद्दाख, जिसे 2019 में सरकार के द्वारा केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, आज एक बड़े राजनीतिक संकट के जंजाल पर आ फंसा है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के बाद अचानक हिंसा भड़क जाने, चार युवाओं की मौत और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की NSA के तहत गिरफ्तारी ने इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। बता दें कि यह संघर्ष केवल संवैधानिक दर्जे के लिए नहीं है, बल्कि स्थानीय पहचान, ज़मीन और जन-प्रतिनिधित्व पर नियंत्रण की लड़ाई है। जहां के मूल निवासी अपनी पहचान और जमीन की सुरक्षा की लडाई के लिए उठे खड़े हुए हैं। 
यह लड़ाई आज से शुरू नहीं हुई। यह लड़ाई समय से शुरू हुई थी जब सरकार ने इसे राज्य बनाने का वादा किया था। लेकिन सरकारें बनने के बाद जैसे हर वादा केवल चुनावी मुद्दा रह जाता है। ठीक वैसे ही यह एक वादा बनकर रह गया था। लेकिन यह किसे पता था कि सरकार द्वारा किया गया चुनावी मुद्दा लद्दाख के लोगों को इसकी वादे की मांग पूरी करने के लिए सड़कों पर लाकर खड़ी कर देगी। यानि इसकी नींव अगस्त 2019 में रख दी गई थी, जब जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन हुआ और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया, वह भी बिना विधानसभा के। हालांकि स्थानीय लोगों ने इसका स्वागत किया लेकिन शुरुआत से एक मांग रखी कि उन्हें जम्मू-कश्मीर से अलग होना है। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। .jpeg)
इसके बाद उन्होंने इसके लिए आन्दोलन की शुरुआत की जिसमें मुख्य मांगे थी:
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इस दौरान लेह और कारगिल के राजनीतिक रूप से विरोधी गुट, LAB (बौद्ध बहुल) और KDA (मुस्लिम बहुल), पहली बार एक साथ आए। और इस प्रदर्शन को और मजबूती देने में जुट गए। जिसके बाद केंद्र सरकार ने आंदोलन के नेता सोनम वांगचुक पर आरोप लगाया कि उन्होंने "अरब स्प्रिंग" और "नेपाल के जेन जेड विरोध" जैसे शब्दों का उपयोग कर युवाओं को उकसाया, जिसके कारण 24 सितंबर को हिंसा भड़क उठी। दूसरी ओर, LAB और KDA के नेताओं ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर बल के प्रयोग और गोलीबारी का आरोप लगाया, जिसके कारण 4 युवाओं की मौत हुई। जिसके बाद सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को NSA के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं उनके NGO को विदेश से आ रहे फंड के लाइसेंस को भी रद्द कर दिया गया। .jpg)
हालांकि हिंसा के तीसरे दिन भी लेह में कर्फ्यू जारी है और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई है। सड़कों पर पुलिस, सीआरपीएफ और आईटीबीपी के जवान भारी संख्या में तैनात हैं। प्रशासन की ओर से हालात सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन अब भी मुद्दा वहीं आ फंसा है कि लद्दाख का यह संकट अब केवल स्थानीय मांगें नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक वादों को पूरा करने के केंद्र के वादे पर एक सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है। एक तरफ, जहां सरकार ने NSA के तहत गिरफ्तारी और इंटरनेट बंदी जैसे कठोर कदम उठाया है और संदेश देने की कोशिश में लगी है कि वह हिंसा और अस्थिरता को बर्दाश्त नहीं करेगी। वहीं दूसरी तरफ, सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने इस शांत क्षेत्र के युवाओं के असंतोष को और भी भड़का दिया है। अब देखना यह होगा की सरकार इन मुद्दों किस तरह से संभालती है। और कहाँ तक उनकी मांगे पूरी की जाती है।