नई दिल्ली
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने पर मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सरसंघचालक पद को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस पद के लिए ब्राह्मण होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। भागवत ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र- किसी भी जाति का व्यक्ति सरसंघचालक बन सकता है। उन्होंने कहा कि संघ में पद किसी की जाति देखकर नहीं दिए जाते, बल्कि कार्य और समर्पण को प्राथमिकता दी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि एससी-एसटी समुदाय से आने वाला व्यक्ति भी इस सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है। “ब्राह्मण होना योग्यता नहीं और एससी-एसटी होना अयोग्यता नहीं,” उन्होंने कहा।

‘संघ का विस्तार जाति नहीं, भूगोल के आधार पर’
संघ प्रमुख ने कहा कि शुरुआती दौर में संघ का काम एक छोटे क्षेत्र से शुरू हुआ था, जो ब्राह्मण बहुल इलाका था। इसी कारण उस समय अधिकतर पदाधिकारी ब्राह्मण समुदाय से थे और लोगों में यह धारणा बनी कि संघ सिर्फ ब्राह्मणों का संगठन है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि अब संघ का दायरा काफी व्यापक हो चुका है। संगठन का विस्तार जाति के आधार पर नहीं, बल्कि भौगोलिक क्षेत्रों में किया जाता है। शहरों की बस्तियों और गांवों के मंडलों तक संघ की गतिविधियां पहुंचाई जाती हैं, जिससे विभिन्न समुदायों के लोग जुड़ते हैं। भागवत ने कहा कि आज अखिल भारतीय स्तर पर संघ में सभी जातियों के लोग सक्रिय भूमिका में हैं।
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