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केरल में RJD के दिग्गज नेता पी.आर. कुरूप की 25वीं पुण्यतिथि पर झारखंड के श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव ने अर्पित की श्रद्धांजलि

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द फॉलोअप डेस्क
केरल के कन्नूर ज़िले में झारखंड के श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव, केरल की राजनीति के दिग्गज और सामाजिक न्याय के पुरोधा रहे राजद के बड़े नेता पी. आर. कुरूप की 25वीं पुण्यतिथि के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे। इस कार्यक्रम में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेताओं, विधायकों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पी. आर. कुरूप को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और समाज के लिए उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को याद किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप में झारखंड के श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव, कूथुपरम्बा के विधायक के. पी. मोहनन, पूर्व मंत्री  निलालोहिथादशन नादर, पूर्व विधायिका जमिला प्रकाशम और आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष एम. वी. श्रेयम्स कुमार उपस्थित रहे। इसके अलावा संगठन के विभिन्न प्रदेश एवं जिला स्तर के पदाधिकारी भी मंच पर मौजूद थे।

वक्ताओं ने पी. आर. कुरूप के गौरवशाली राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे 1957 से 2001 के बीच केरल विधानसभा के लिए सात बार विधायक चुने गए। उन्होंने केरल सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री के रूप में सेवाएं दीं। वर्ष 1967 में ई. एम. एस. मंत्रालय और 1996 में ई. के. नयनार मंत्रालय में उन्होंने मंत्री पद संभाला। कृषि, जल संसाधन, परिवहन और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभालते हुए उन्होंने अभूतपूर्व कार्य किए। उनके द्वारा 1967 में लागू किया गया ‘समग्र सहकारिता विधेयक’ आज भी राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श माना जाता है।
 

पी. आर. कुरूप केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के रक्षक भी थे। 1971 के थलस्सेरी सांप्रदायिक दंगों के दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के साथ मिलकर पन्नूर और आसपास के इलाकों में शांति व्यवस्था कायम करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता के कारण उन पर कई बार जानलेवा हमले भी हुए, जिनमें 1964 में थलस्सेरी न्यायालय परिसर में हुआ हमला सबसे गंभीर था, हालांकि वे इसमें बाल-बाल बच गए थे। पी. आर. कुरूप एक कुशल वक्ता के साथ-साथ उत्कृष्ट लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा "एंटे नादिंते कथा, एंटेयुम" साहित्य जगत की एक प्रमुख कृति मानी जाती है। उन्होंने "वज्रभूमि" संग्रह के माध्यम से भी अपने विचार जनता तक पहुंचाए। कार्यक्रम में उन्हें सामंती व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने वाला एक योद्धा और दलितों के लिए आशा की किरण बताया गया। 17 जनवरी 2001 को उनके निधन के 25 वर्षों बाद भी उनका जनसंपर्क और उनकी विरासत आज भी उनके अनुयायियों को प्रेरित कर रही है।



 

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