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हिन्दी को तमिलनाडु में कभी स्वीकार नहीं करेंगे: भाषा शहीद दिवस पर सीएम स्टालिन का ऐलान

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चेन्नई
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने एक बार फिर हिन्दी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। ‘भाषा शहीद दिवस’ के मौके पर स्टालिन ने साफ कहा कि तमिलनाडु में हिन्दी के लिए न पहले कोई जगह थी, न आज है और न भविष्य में होगी। उनके इस बयान के बाद राज्य में भाषा को लेकर चल रही बहस फिर तेज हो गई है।


रविवार को चेन्नई में डीएमके द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने उन लोगों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने अतीत के हिन्दी विरोधी आंदोलनों के दौरान अपनी जान गंवाई थी। इस अवसर पर स्टालिन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि तमिलनाडु ने हमेशा हिन्दी थोपे जाने का एकजुट होकर विरोध किया है और आगे भी करता रहेगा।


स्टालिन ने कहा कि तमिल समाज अपनी भाषा से जीवनधारा जैसा जुड़ाव रखता है और जब-जब उस पर दबाव डालने की कोशिश हुई, राज्य ने साहस के साथ प्रतिरोध किया। उन्होंने हिन्दी विरोधी आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें 1965 के आंदोलन और डीएमके के दिवंगत नेताओं सी एन अन्नादुरै और एम करुणानिधि की भूमिका का उल्लेख किया गया है।


गौरतलब है कि तमिलनाडु आज भी दो-भाषा फार्मूले—तमिल और अंग्रेज़ी—का पालन करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लागू होने के बाद यह मुद्दा फिर सामने आया है। डीएमके का आरोप है कि केंद्र सरकार एनईपी के ज़रिये हिन्दी को अप्रत्यक्ष रूप से थोपने की कोशिश कर रही है, जबकि तमिलनाडु सरकार ने अब तक इस नीति को लागू नहीं किया है।


वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही इन आरोपों को खारिज करते हुए कह चुके हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देती है और इसमें हिन्दी को अनिवार्य बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि तमिलनाडु सरकार इस मुद्दे पर राजनीति कर रही है।


इसके बावजूद, स्टालिन के ताज़ा बयान ने यह साफ कर दिया है कि भाषा का सवाल तमिलनाडु में सिर्फ नीति नहीं, बल्कि पहचान और अस्मिता से जुड़ा मुद्दा बना हुआ है।

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