दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने साल 2000 में लाल किला पर हुए अतंकी हमले (terrorist attack on Red Fort) के दोषी मोहम्मद आरिफ की फंसी की सजा को बरकरार रखा है। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि उनका दोष साबित हो चुका है। उसकी सजा कम नहीं की जा सकती। हम अदालत के फैसले से सहमत हैं। इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए दायर की गयी याचिका खारिज करते हैं। बता दें कि इस हमले में तीन लोगों ने अपनी जिंदगी गंवाई थी। इनमें दो सेना के जवान थे।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार करने के आवेदन को किया स्वीकार
फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की एक पीठ ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार करने के आवेदन को स्वीकार किया है। पीठ ने कहा है कि, हम उस आवेदन को स्वीकार करते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार किया जाना चाहिए। वह दोषी साबित हुआ है। हम इस अदालत द्वारा किए गए फैसले को बरकरार रखते हैं और पुनर्विचार याचिका खारिज करते हैं।
2007 में हुई थी सजा कि पुष्टि
बता दें कि साल 2005 में निचली अदालत ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और हत्या के आरोप में उसे फांसी की सजा दी थी। 2007 में हाईकोर्ट ने इस सजा की पुष्टि की। 2011 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी एस सिरपुरकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने भी इस सजा को बरकरार रखा।

साल 2000 में हुआ था हमला
22 दिसंबर 2000 को लाल किला पर आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा ने हमला किया था। हमला रात करीब 9 बजे भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स के बेस कैंप पर किया गया था। इस हमले में तीन लोगों की मौत हुई थी जिसमें दो सेना के जवान भी थे। इस हमले से पूरे इलाके में दहशत का महौल बन गया था। वहीं,सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार के हमले को बड़ा अपराध मान कर अपराधी आरिफ को फांसी की सजा सुनाई थी।