द फॉलोअप डेस्क
अमेरिका के द्वारा भारत पर 50% टैरिफ़ लगाने के बाद पुरे देश में हलचल मच गई है। वहीं महाराष्ट्र के सोलापुर में टेरी टॉवेल उद्योग के लिए भी एक बड़ा संकट पैदा कर दिया है। इस टैरिफ़ के बाद मज़दूर नेताओं और स्थानीय उद्यमियों के अनुसार, इस उद्योग में काम करने वाले कम से कम 5 हज़ार मज़दूरों पर एक-दो महीने में बड़ी बेरोज़गारी का ख़तरा आ सकता है। साथ ही लगभग 200 करोड़ का वार्षिक निर्यात प्रभावित हो सकता है।
ये दावा मज़दूर नेता और सीपीआई(एम) के पूर्व विधायक नरसय्या आडम मास्तर ने बीबीसी मराठी से बातचीत के दौरान किया है। सोलापुर चेंबर ऑफ़ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर के अनुसार इस उद्योग में लगभग 40 हज़ार मज़दूर काम करते हैं, जिनमें से 40% से ज़्यादा महिलाएं भी शामिल हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों पर काफी बड़ा असर देखने को मिल सकता है। .jpeg)
सोलापुर के स्थानीय उद्यमियों ने बीबीसी से बातचीत के दौरान बताया कि टैरिफ के घोषणा के बाद, सोलापुर से भेजे गए टेरी टॉवेल्स के कुछ कंटेनरों को रोक दिया गया है। तिलोकचंद शाह, जो सोलापुर स्थित 'कंसवा टेक्सटाइल्स' के मालिक हैं, ने बताया कि उनका 20 टन का मासिक निर्यात सीधे अमेरिका को होता है, लेकिन टैरिफ़ की वजह से इस तिमाही के सभी ऑर्डर फिलहाल होल्ड पर हैं। उन्होंने कहा, "हमने भी उत्पादन धीमा कर दिया है और अब वैकल्पिक बाज़ारों की तलाश कर रहे हैं।"
विशेषज्ञों ने बताया है कि 50% टैरिफ़ के बाद सोलापुर के टॉवेल अब वियतनाम, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों से आने वाले टॉवेल की तुलना में अधिक महंगे हो जाएंगे, जिससे अमेरिका में ग्राहक बनाए रखना मुश्किल होगा। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव ने बीबीसी को बताया कि अमेरिकी ख़रीदार अब मेक्सिको, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों के साथ व्यापार बढ़ा सकते हैं। जिसके बाद भारत को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 
बताया जाता है कि कभी मुंबई के बाद महाराष्ट्र का सबसे बड़ा कपड़ा उत्पाद केंद्र रहा सोलापुर, अब सिर्फ़ चादरों और तौलियों के लिए जाना जाता है। और वर्तमान में इस उद्योग का सालाना कारोबार क़रीब 2,000 करोड़ रुपये है, जिसमें से 800 से 900 करोड़ रुपये का निर्यात होता है। वहीं अमेरिका को होने वाला निर्यात क़रीब 200 करोड़ रुपये का है, जो अब खतरे में लग रहा है। यह संकट सोलापुर के वस्त्र उद्योग के लिए एक और बड़ा झटका हो सकता है, जो पहले ही कई सरकारी नीतियों और बाज़ार की बदलती परिस्थितियों के कारण गिरावट की समस्या झेल रहा है।