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30 जून को चली जाएगी 131 व्यवासायिक प्रशिक्षकों की नौकरी, साहब! नियुक्ति वर्ष का जश्न मनाएं या बेरोजगारी का मातम

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सूरज ठाकुर, रांची: 

राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत झारखंड के उच्च तथा प्लस टू विद्यालयों में कार्यरत 131 व्यवासायिक प्रशिक्षक 30 जून से बेरोजगार हो जाएंगे। कोरोना काल की इस मुश्किल घड़ी में उनके पास 30 जून के बाद कोई काम नहीं होगा क्योंकि इस परियोजना के संचालन का जिम्मा संभालने वाली झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल और निजी कंपनी क्वेस कॉर्प लिमिटेड ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए इनको कार्यमुक्त करने की घोषणा कर दी थी। हैरानी की बात ये है कि झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल और क्वेस कॉर्प कंपनी के बीच एमओयू और पॉलिसी को लेकर हुई खटपट का खामियाजा व्यवासायिक प्रशिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है। 

एक ऑनलाइन मीटिंग और 131 लोगों की बेरोजगारी
आखिर क्यों औऱ कैसे राज्य के 131 व्यवासायिक प्रशिक्षक एक झटके में बेरोजगार हो जाएंगे। क्यों उनको अचानक निकाल दिया गया। इस पूरे मामले को समझने के लिए हमने दो व्यवासायिक प्रशिक्षकों से बातचीत की। व्यवासायिक प्रशिक्षक आलोक पाठक और दिलीप ओझा से हमने पूरा मामला समझा। इन्होंने जो बताया, उसे जानकर हैरानी हुई कि कैसे पांच लाख नौकरियों का वादा करने वाली और कागजों में नियुक्ति वर्ष का मेगा इवेंट करने वाली सरकार रोजगार के वास्तविक मसले पर असंवेदनशील है। कैसे मामले की लीपापोती कर दी जाती है। 

30 अप्रैल को व्यवासायिक प्रशिक्षकों को कार्यमुक्त किया
30 अप्रैल 2021। झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल के राज्य परियोजना पदाधिकारी स्वप्निल कुजूर और क्वेस कॉर्प कंपनी की प्रोजेक्ट मैनेजर ने ऑनलाइन मीटिंग बुलाई। मीटिंग में सभी 131 व्यवासायिक प्रशिक्षकों को बुलाया गया। उन पर एक गाज गिराई गयी। कहा गया कि आपको कार्यमुक्त किया जाता है। लेकिन ऐसा क्यों किया गया। दरअसल, झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल (JEPC) नए एमओयू में नई पॉलिसी लाई। कहा गया कि जो भी कंपनी इस प्रोजेक्ट में काम करेगी उसे परियोजना के तहत कार्यरत सभी 131 व्यवासायिक प्रशिक्षकों के वेतन का 15 फीसदी बतौर बैंक गारंटी जमा करानी होगी। 3 माह बाद वेतन संबंधी दस्तावेज जमा कराने होंगे। कंपनी ने इसको मानने में असमर्थता जताई। कंपनी ने कहा कि वो आगे इस परियोजना में काम नहीं कर सकती। इस विवाद की गाज गिराई गई व्यवासायिक प्रशिक्षकों पर। उनको कार्यमुक्त किया गया। ना कोई नोटिस दी गई और ना ही अग्रिम सूचना। 

रात को 12 बजे मेल कर नौकरी से निकाल दिया गया
व्यवासायिक प्रशिक्षक आलोक पाठक ने द फॉलोअप संवाददाता को बताया कि जब प्रशिक्षकों ने लिखित सूचना या अग्रिम नोटिस की बात उठाई तो उनको सात मई को रात तकरीबन 12 बजे मेल किया गया। कहा गया कि कंपनी आपके साथ कन्टीन्यू नहीं करेगी। फिर 19 मई को कहा गया कि 2 महीने का एक्सटेंशन दिया जाता है 30 अप्रैल की सूचना के आधार पर। अब इसकी समय सीमा 30 जून को खत्म होने जा रही है जिसमें अब महज 9 दिन बाकी रह गये हैं। आलोक का कहना है कि कंपनी और जेईपीसी के विवाद में बिना वजह व्यावसायिक प्रशिक्षकों को लपेटा गया। उन लोगों ने व्यवासायिक प्रशिक्षण के लिए काफी मेहनत की। काम किया। इसका ये इनाम मिला कि एक झटके में नौकरी ही छीन ली गयी। उनका कहना है कि उन्होंने इस बाबत राज्य परियोजना पदाधिकारी स्वप्निल कुजूर से बात की। कहा कि उनकी सेवा खत्म ना की जाये। 

कंपनी को आपकी सेवा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता!
आलोक बताते हैं कि व्यवासायिक प्रशिक्षकों ने इस बाबत राज्य परियोजना पदाधिकारी स्वप्निल कुजूर से बातचीत की। वहां कहा गया कि नई कंपनी आपको लेगी या नहीं इसका फैसला हम नहीं कर सकते। हम कंपनी को बाध्य नहीं कर सकते कि वो आपको ही बतौर व्यवासायिक प्रशिक्षक सेवा में ले। इसको लेकर आलोक सहित कई व्यवासायिक प्रशिक्षकों का कहना है कि पॉलिसी तो झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल बनाती है। इसी पॉलिसी की वजह से कंपनी औऱ परियोजना के बीच करार टूट गया। ऐसे में ये तर्क बेतुका लगता है कि कंपनी को बाध्य नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि ये सरकार और परियोजना की घनघोर असंवेदनशीलता है। 

व्यवासायिक प्रशिक्षकों को नहीं मिला 3 माह का वेतन
व्यवासायिक प्रशिक्षक आलोक कहते हैं कि उनको बीते 2 महीने से वेतन नहीं मिला। इस महीने का वेतन भी उनको नहीं दिया गया है। रिपोर्टिंग अथॉरिटी से जब वेतन के बाबत सवाल पूछा जाता है तो कोई जवाब नहीं मिलता। इस तरीके से अचानक नौकरी से निकाले जाने औऱ सेवा विस्तार की मांग को लेकर कई बार शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों, सीएमओ और जेईपीसी के अधिकारियों को मेल किया जा चुका है लेकिन किसी भी मेल का जवाब नहीं दिया गया। किसी भी सरकारी प्रक्रिया में कम से कम सवालों का जवाब पाने का हक तो होता ही है। वो भी नहीं दिया जा रहा है। आलोक का कहना है कि इससे प्रशिक्षकों का नुकसान तो हुआ ही है, साथ ही बच्चों के भविष्य से भी खिलवाड़ किया जा रहा है। व्यवासायिक शिक्षा का भविष्य राज्य में क्या होगा। 

तीन साल का अनुभव रखते हैं सभी व्यवासायिक प्रशिक्षक
एक अन्य व्यवासायिक प्रशिक्षक दिलीप ओझा ने द फॉलोअप संवाददाता को बताया कि तकरीबन सभी 131 प्रशिक्षक तीन साल का अनुभव रखते हैं। सारे लोग किसी ना किसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहे थे। जब झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल की पहल देखी तो लगा यहां कुछ अलग करने को मिलेगा। सरकारी नौकरी होगी। जॉब की सिक्योरिटी भी रहेगी। कंपनी छोड़कर परियोजना ज्वॉइन कर लिया। सरकारी स्कूलों में पढ़ाने लगे। प्रशिक्षकों ने ना केवल क्लास लिया बल्कि बच्चों को व्यवासायिक प्रशिक्षण के प्रति जागरूक किया। यही नहीं, डोर-टू-डोर जाकर अभिभावकों को समझाया कि बच्चों को व्यवासायिक शिक्षा भी दिलाएं। दिलीप ओझा का कहना है कि हमने अपनी व्यवासायिक क्षमता से ज्यादा काम किया। 

व्यक्तिगत स्तर पर छात्रों को प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया
दिलीप ने द फॉलोअप को बताया कि जब लॉकडाउन नहीं लगा था तो वे बच्चों के घरों में गये। उनको व्यवासायिक शिक्षा के प्रति जागरूक किया। उनके माता-पिता को समझाया। पर अब बच्चों में इसको लेकर रूचि का अभाव दिख रहा है। इसकी वजह है मीडिया में छन-छनकर आती व्यवासायिक प्रशिक्षकों के बेरोजगार हो जाने की खबरें। बच्चों का कहना है कि जिन शिक्षकों ने उनको कन्विंस किया। जिनके कहने पर वे व्यवासायिक शिक्षा में आये। भविष्य का सपना बुना, उन्हीं का भविष्य सुरक्षित नहीं है। उनकी ही जॉब सिक्योर नहीं है तो हमारा क्या होगा। अभिभावक भी पशोपेश में हैं कि ये प्रशिक्षक चले जाएंगे तो नए प्रशिक्षक आएंगे। या शायद नहीं आएंगे। ऐसे में अपने बच्चों को व्यवसायिक शिक्षा की तरफ पुश करने का फायदा होगा या नहीं। 

कंपनी या परियोजना ने किसी भी मेल का जवाब नहीं दिया
दिलीप बताते हैं कि अप्रैल माह के बाद से उनके किसी भी मेल का जवाब कंपनी या परियोजना की तरफ से नहीं दिया गया। लॉकडाउन की वजह से क्लास नहीं हो रही। उनसे जूम, व्हाट्सएप या गूगल मीट के जरिए बच्चों को पढ़ाने को कहा गया। आईटी की पढ़ाई तब भी ऑनलाइन की जा सकती है लेकिन ऑटोमोबाइल की पढ़ाई कैसे मुमकिन होगी। बावजूद इसके वे अपना सौ फीसदी देते हैं। जब स्कूल खुला था तो सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे की शिफ्ट होती थी। पर अब कंपनी ने कहा है कि आप सुबह 8 से रात 8 बजे तक तैयार रहिये। किसी भी वक्त आपसे काम की रिपोर्ट मांगी जा सकती है। रिपोर्टिंग की प्रक्रिया भी काफी सख्त है। सभी व्यवासायिक प्रशिक्षक अपनी पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं। बावजूद इसके उनके पास जॉब की सिक्योरिटी नहीं है। 

जानिए! क्या है व्यवासायिक प्रशिक्षकों की सरकार से मांग
व्यवासायिक प्रशिक्षकों की मांग है कि सरकार मामले का संज्ञान ले और अचानक कार्यमुक्त कर दिए जाने का तुगलकी फरमान वापस ले। उन्होंने निजी कंपनियों की नौकरी छोड़ सरकारी सेवा में आने का फैसला इसलिए किया था क्योंकि यहां जॉब सिक्योरिटी थी। काम में नई चुनौतियां थी। उन्होंने कई बच्चों को व्यक्तिगत तौर पर व्यवासायिक प्रशिक्षण के लिए तैयार किया। कम से कम सरकार इन सभी 131 प्रशिक्षकों से वार्ता तो कर ही सकती है। इनकी बात तो सुन ही सकती है। कोरोना काल में इस तरीके से अचानक बेरोजगार हो जाना कितना मुश्किल भरा होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। व्यवासायिक प्रशिक्षक चिंतित हैं। 

नियुक्ति वर्ष का जश्न मनाएं या बेरोजगारी का मातम
प्रत्येक साल पांच लाख नौकरियों का वादा कर सत्ता में आई सरकार और साल 2021 को नियुक्ति वर्ष घोषित करने वाली सरकार में एक भी नियुक्ति नहीं हुई। बहालियां की भी गई तो केवल संविदा पर आधारित। पहले तो नई नियमावली के नाम पर पुरानी नियुक्ति प्रक्रियाएं रद्द कर दी गईं बाद में कहा गया कि 2016 से पहले की नियमावली के आधार पर ही नियुक्तियां की जाएंगी। कह तो दिया लेकिन आज तक एक भी नियुक्ति प्रक्रिया नहीं निकाली गई। स्थिति बदहाल है। बेरोजगारी से त्रस्त झारखंड के युवा अब नियुक्ति वर्ष-2021 का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ट्विटर पर झारखंडी युवा मांगे रोजगार नाम से कैंपेन चलाया जा रहा है। मांग एक ही है कि रोजगार दो।