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पिछड़े समाज के लोग क्‍या कभी दलित आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते!

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सूरज पाल चौहान 
देश को आजाद हुए 70-72 वर्षों से अधिक हो गए हैं। दलितों के उत्थान के साथ-साथ बाबा साहेब डाॅॅ. अम्बेडकर जी ने ओ.बी.सी समाज के उत्थान के लिए भी अनेक कार्य किए हैं। लेकिन ओ.बी.सी. समाज के लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। इस समाज के लोगों ने बाबा साहेब की तो छोडो़ अपने ओ.बी.सी. समाज के महापुरुषों की भी नहीं सुनी। इस समाज के लोग अपने महापुरुषों को बिसराए बैठे हैं जबकि दलित समाज के लोग इन के महापुरुषों की शिक्षाओं को ले कर सफलता के शिखर को चूमने में लगे हैं। दूसरी ओर, पिछडे़ समाज के लोग आज भी हिन्दूवादी व्यवस्था को ही ढोने में लगे हुए हैं। इस समाज के अधिकतर बुद्धिजीवी भी दिग्भ्रमित हैं। पिछडे़ समाज के बुद्धिजीवी अपने समाज के बीच न जा कर दलितों के मंचों पर आ कर अपनी बुद्धिमता झाड़ते रहते हैं। दरअसल इन बुद्धिजीवियों की वहाँ कोई सुनने को तैयार नहीं है। इन के पास अपने लोगों को सुनाने के लिए है ही क्या? इन्हें न तो अपने इतिहास, संस्कृति, परम्परा का पता है और न ही अपने पुरखों का। इसीलिए ये बेचारे दलितों के मंचों पर आ कर बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का पाठ उन्हें पढा़ कर खुद को बुद्धिजीवी होने का दंभ भरते रहते हैं।

एक वामपंथी पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से बाबा साहेब डाॅॅ. अम्बेडकर पर बनी स्पीच को ही दलितों के मंचों से दोहराने में लगा हुआ है और वाहवाही लूट रहा है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि दलित दस्तक के आज से तीन वर्ष पूर्व एक कार्यक्रम में जो स्पीच उस ने सुनाई थी उसे ही वह जगह-जगह दलितों के मंचों पर सुनाने में लगा है। अभी हाल ही में 09 जनवरी, 2021 के दिन स्वामी अछूतानंद जी की पुस्तक पर उस ने वही राग अलापा। स्वामी अछूतानंद के बारे में वह कुछ जानता ही नहीं था। बेचारा बोले तो भला क्या बोले? अब समय आ गया है कि ऐसे बुद्धिजीवियों से दलितों का मोहभंग हो जाना चाहिए। 



पिछडो़ं समेत समस्त गैर दलितों को यहाँ बताया जाना जरूरी है कि दलित चिंतन अब आजीवक चिंतन में बदल गया है जिस के घेरे में खुद डा. अम्बेडकर आ गये हैं। ऐसे में डा. अम्बेडकर के नाम पर अब गैर दलितों की दलित समाज में दाल गलने से रही। वैसे भी दलित चिंतन में बाबा साहेब की प्रशंसा या आलोचना दलित के मुख से ही सुनी जानी है। इस का अधिकार गैर दलितों को कतई मिलने वाला नहीं। इसलिए, दलित की ओर से पिछडो़ं को एक नेक सलाह यह है कि वे अपनी सारी बुद्धिमता अपनी जडो़ं को खोजने में लगाएं।

दूसरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि पिछड़े समाज के लोग कभी दलित आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते। हमें इन पर अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी चाहिए। कारण, देश का पिछडा़ समाज हिन्दू समाज (वर्ण-व्यवस्था) का आधार-स्तम्भ है। ठाकुर-बाभनों ने इस वर्ण को बनाया ही अपनी गुलामी करवाने के लिए है। देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह जी ने इन के उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की थी लेकिन इस समाज के लोग आज भी कहते फिरते हें कि, 'वी.पी. सिंह, हमें आरक्षण दे कर शिड्यूल्ड कास्ट बना कर चला गया।' यह हाल है इस ओ.बी.सी. समाज के लोगों का।



(सूरजपाल चौहान मशहूर दलित साहित्यकार हैं। प्रयास, क्यों करूँ विश्वास, कब होगी वह भोर, बच्चे सच्चे किस्से, बाल मधुर गीत (कविता-संग्रह), हैरी कब आएगा, सन्तप्त और तिरस्कृत (कथा संग्रह) उनकी प्रकाशित प्रमुख पुस्तकें हैं। वो हिन्दी साहित्य परिषद पुरस्कार और रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार आदि सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। सहमति के विवेक के साथ असहमति के साहस का भी हम सम्मान करते हैं।