कनक तिवारी
स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी1863- 4 जुलाई1902) हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले पलायनवादी साधु नहीं थे। उन्हें भारत के तैंतीस करोड़ लोगों से, जिन्हें वह देवता की संज्ञा देते थे, बेसाख्ता मोहब्बत थी। समाज की कुरीतियों पर, जिनमें जातिवाद प्रमुख था, वे कहर बन कर टूट पड़े थे। अत्याचारियों का वध करने तक की बात उन्होंने कही थी। उन्होंने भारत में पिछड़ी जातियों अर्थात् शूद्र राज की ऐतिहासिक भविष्यवाणी की थी। यह विवेकानंद ही थे, जिन्होंने धार्मिक कठमुल्लापन के खिलाफ सदैव जिहाद बोला। उन्होंने भारतीयों को इन शब्दों में ललकारा था, ‘हे वीर, निर्भीक बनो, साहस धारण करो। इस बात पर गर्व करो कि हम भारतीय हैं और गर्व के साथ कहो कि मैं भारतीय हूं और हर भारतीय मेरा भाई है, बोलो ज्ञानहीन भारतीय, दरिद्र भारतीय, ब्राह्मण भारतीय, अछूत भारतीय मेरा भाई है। कहो प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है। भारतीयता मेरा जीवन है। भारत के देवी देवता मेरे ईश्वर हैं। भारतीय समाज मेरे बाल्यकाल का पालना है। मेरे यौवन का आनन्द उद्यान है। पवित्र स्वर्ग है और मेरी वृद्धावस्था की वाराणसी है। हे शक्ति की मां मेरी निर्बलता को दूर करो। मेरी पौरुषहीनता को हटा लो और मुझे मनुष्य बना दो।'
इस्लामी देह में वेदांती मन यानी मानवीय गरिमा का उत्कर्ष
सबसे पहले विवेकानंद ने ही धार्मिक पंथसापेक्षता को सेक्युलरिज़्म का अर्थ बताया था। उनके हिन्दुस्तान में कोई भी धर्म अप्रासंगिक तो था ही नहीं। वह एक अनिवार्य उपस्थिति और आचरण था। इस देश को हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन किसी की एकल जागीर नहीं समझा जा सकता। आज हम भूलते जा रहे हैं कि बंगाल में काली और दुर्गा की मूर्तियां मुसलमान कारीगर ही बेहतर बनाते हैं। विवेकानंद ने भारत के दो बड़े धर्मों के अनुयायियों के मद्देनजर एक मार्के की बात अपने मित्र सरफराज हुसैन को लिखे पत्र में की थी। यह विवेकानंद थे जिन्होंने कहा था कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदांती मन होगा, वह मानवीय गरिमा का उत्कर्ष होगा। यहां विवेकानंद इस्लामी सभ्यता और भारतीय अथवा हिन्दू संस्कृति के अमलगम की बात करते हैं। यह देश में आज तक किसी ने नहीं कहा। यदि हिन्दुओं के त्यौहारों में गैर हिन्दू, इस्लाम की इबादत में गैर मुस्लिम, सिक्खों के गुरुद्वारों में गैर सिक्ख, बौद्ध विहारों में गैर बौद्ध, तटस्थ, निरपेक्ष, निस्पृह और उदासीन आचरण को सेक्युलरिज़्म समझेंगे तो वह विवेकानंद के बगैर भारत में हो ही रहा है। स्वामी जी होते तो आज देश एक नई आध्यात्मिक सर्वदेशीय, सर्वभाषिक संस्कृति की बुनियादी पाठशाला बनना चाहता।
भारत को विभिन्न धार्मिक समुदायों की संगठित भूमि होना चाहिए
सुभाषचन्द्र बोस उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। नेताजी ने कहा है, ‘स्वामी विवेकानंद की बहुमुखी प्रतिभा का वर्णन करना कठिन है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी कृतियों एवं व्याख्यानों से हमारे समय के छात्रों को जितना प्रभावित किया वह देश के किसी भी नेता को काफी पीछे छोड़ गया है। स्वामीजी ने उनकी आशाओं एवं आकांक्षाओं को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त किया है। (किन्तु) स्वामीजी का अध्ययन स्वामी रामकृष्ण परमहंस देव जी के साथ किए बिना, उन्हें यथोचित रूप से समझना कठिन है। वर्तमान स्वतन्त्रता आन्दोलन की आधारशिला अपने उद्भव के लिए स्वामीजी के सन्देश की ऋणी है। यदि भारत को स्वतंत्र होना है, तो यह मात्र हिन्दुवाद अथवा इसलाम की एकल भूमि नहीं हो सकता-इसे राष्ट्रवादी आदर्शों से अभिप्रेरित विभिन्न धार्मिक समुदायों की संगठित भूमि होना चाहिए। (और उसके लिए) भारतवासियों को धर्मों की समता के उपदेश को पूर्ण हार्दिकता से स्वीकार करना चाहिए, यही रामकृष्ण विवेकानंद का उपदेश है।‘
धर्म और विज्ञान के समन्वय की बातें सबसे पहले विवेकानंद ने की
धर्म और विज्ञान के समन्वय की बातें भी भारत की धरती पर सबसे पहले विवेकानंद ने की थीं। यह उनकी सलाह थी जिसके कारण प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने देश में तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोले थे और अपने संस्थान के पहले निदेशक के पद पर स्वामीजी से नियुक्त होने की प्रार्थना की थी। स्वामी विवेकानंद ने भौतिकवाद को कभी अभिशाप नहीं समझा। वे भारत की आध्यात्मिक उन्नति के साथ साथ आर्थिक प्रगति भी चाहते थे। वे हिन्दुस्तान में जीने वाले करोड़ों इंसानों को कीड़े-मकोड़े नहीं समझते थे। मार्क्स सर्वहारा वर्ग को अंकगणित की इकाइयां समझकर उन्हें क्रांति के सिपाहियों के रूप में तब्दील करना चाहता था। विवेकानंद ने एक एक मनुष्य के अन्दर आध्यात्मिक शक्ति के दर्शन किये थे। उन्हें ऐसी शक्तियों से लैस करके निर्णयात्मक लड़ाई लड़ने के पक्षधर थे। मास्को और पेइचिंग के विश्वविद्यालयों में विवेकानंद की शिक्षाओं पर शोध कार्य अब भी जारी है।
विवेकानंद के जीवन का मूल उद्देश्य गरीबों के उत्थान
भारत से उन्हें इसलिए असीम प्यार था क्योंकि दुनिया के देशों में केवल भारत है, जिसने न केवल आदर्शों को जन्म दिया है परन्तु आदर्शों की रक्षा के लिए उसने असाधारण तकलीफें उठाई हैं और असंख्य कुर्बानियां की हैं। स्वामी विवेकानंद के सबसे छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त ने यह तर्क किया है कि विवेकानंद के जीवन का मूल उद्देश्य गरीबों के उत्थान से था। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए उन्होंने विदेशी सम्राज्य को नेस्तनाबूद करने के लिए क्रांतिकारी घटक की स्थापना भी की थी। लगता है विवेकानंद गोमुख थे, तिलक गंगोत्री और गांधी हरिद्वार जहां से स्वाधीनता संघर्ष की गंगा स्वरूप ग्रहण करती है। शक्ति विवेकानंद की भारतीय राष्ट्र को वसीयत है। विवेकानंद को ध्यान में रखे बिना भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के जन्म तथा विकास को नहीं समझा जा सकता. उनकी स्वतंत्रता की अवधारणा व्यापक होने के साथ चुटीली भी है।
कोई बात तर्क के जरिए परखे बिना नहीं मानना चाहिए
विवेकानंद को शायद बीसवीं सदी ने ठीक से नहीं समझा। लगता है विवेकानन्द समय के पूर्व ही पैदा हो गए थे। उनका यश शायद इक्कीसवीं सदी में काम आएगा। जातिवाद, अस्पृश्यता, स्त्री-पुरुष की बराबरी, वैज्ञानिकता, सर्वधर्मसम्भाव सम्बन्धी विवेकानंद के विचार अधुनातन हैं। मैं विवेकानंद का अंध भक्त, समर्थक या प्रचारक नहीं हूं। स्वयं विवेकानंद ने कहा था कि किसी की भी कोई बात या सिद्धांत को तर्क और बहस मुबाहिसे के जरिए परखे बिना मानना नहीं चाहिए। स्वयं नरेन्द्र ने अपने गुरु श्रीरामकृष्णदेव के सामने तब तक नैतिक समर्पण नहीं किया जब तक वे बौद्धिक रूप से उनसे सहमत नहीं हुए। विवेकानंद इस तरह जिरह और जिज्ञासा के विषय हैं।
{रविवार में आए विस्तृत लेख के संपादित अंश}
(संविधान विशेषज्ञ और राजनीतिक चिंतक कनक तिवारी गांधीवादी लेखक माने जाते हैं। स्वामी विवेकानंद पर उनकी शोधपरक पुस्तक प्रकाशित है। इसके अलावा कई किताबें। छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता भी रहे। संप्रति रायपुर में रहकर स्वतंत्र लेखन।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।