सुनीता लकड़ा, रांची:
डुंगडुंग, मिंज, तिर्की (मछली), लकड़ा (लकड़ बग्घा), होरो, कच्छप (कछुवा), टेट (चिड़िया), टोप्पो (कठफोड़वा चिड़या), तिग्गा (बन्दर), खेस (धान), कुजूर (लता), बाखला (घास), जोजो (इमली), बाड़ा (बरगद का पेड़)। ऐसे कई टाइटल हमारे झारखंड में आदिवासियों के होते हैं। जिसे टोटेम कहा जाता है। यह इस बात के परिचायक हैं कि आदिवासी प्रकृति के साथ कितने जुड़े होते हैं। झारखंड के आदिवासी अपने वंश को अलग-अलग पेड़-पौधे या जीव-जंतुओं पर आधारित नाम देते हैं। इसे टोटेमिसम या गंचिन्हवाद के नाम से जाना जाता है। इस प्रथा के हिसाब से दिए हुए चिन्ह से समुदाय अपने पूर्वजों या धारणाओं से जुड़े हुए होते हैं। इन चिन्हों को सहायक, दोस्त, रिश्तेदार या पूर्वज माना जाता है। इन चिन्हों की केवल प्रतीकात्मक अहमियत है।
प्रकृति ही जीवन का पर्याय
5 जून पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि आदिवासी जीवन में पर्यावरण कूट-कूट कर भरा हुआ है। किसी दिवस से कोई लेना देना ही नहीं होता है। सदियों से पर्यावरण प्रकृति ही जीवन का पर्याय रहा है। अपने रहन-सहन, खान-पान, कला-संस्कृति, पर्व-त्यौहार को शादी विवाह हर जगह पर प्रकृति अलग-अलग रूप में देखने को मिल जाएगा।
जीवन के लिए प्रकृति का संरक्षण जरूरी
आदिवासी समुदाय में प्रकृति का बहुत ज्यादा महत्व है। भले ही दुनिया को ये लगता है कि आदिवासी मुख्य दुनिया से अलग है। मगर आदिवासियों को ये नहीं लगता। क्योंकि आदिवासी समुदाय इतना अच्छी तरह से जनता समझता है कि दुनिया को बचाना है। जीवन बचाना है तो प्रकृति का संरक्षण बहुत जरूरी है।
ईंधन के लिए कभी पेड़ नहीं काटते
सदियों से आदिवासी समुदाय के यहां जो जो चूल्हा जलता आ रहा है, उसके ईंधन के लिए पेड़-पौधों ही होते हैं, हाँ। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि उनका जलावन पेड़ों की डाल या सुखी गिरा हुआ पत्तह ही होता है। कभी जलावन के लिए पेड़ नहीं काटे जाते।
खान-पान के लिए भी प्रकृति की निर्भरता
आदिवासी जिंदगी में जल, जंगल, जमीन का महत्व ऑक्सीजन की तरह है। खान पान में भी जितने तरह का साग इस्तेमाल करते हैं, वो कंही न कंही प्रकृति से ही लिया हुआ होता है। और औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जैसे फुटकल साग, कोयनार साग, चिमटी साग, गोलगोला, साग ये सब के सब औषधीय रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।
जीवन से मरण तक प्रकृति का महत्व
उसी प्रकार से आदिवासी समुदाय में एक बच्चे के जन्म से लेकर मरण तक। हर जगह पर प्रकृति से जुड़े संस्कार ही किये जाते हैं। शादियों में आज भी मड़वा पेड़ के पत्तों और डाल से बनाया जाता है। हर श्रृंगार प्रकृति ही परिपूर्ण करती है। सखुआ के पत्ते और डाल इस्तेमाल किये जाते हैं। जीवन के हर पल में प्रकृति है। खुद जीते हैं और हमेशा से ही चाहते हैं कि हरे पेड़-पौधे बने रहें। उसके छाये तले जीवन कटे। जितने तरह के त्योहार मिलेंगें, वो सब के सब नेचर से जुड़े चाहे वो करम हो या सरहुल।
प्रकृति के हम मोहताज हैं, वो हमारे नहीं
इस लॉक डाउन में भले ही इंसानी जीवन के साथ बहुत कुछ अच्छा नहीं हो रहा। मगर पर्यावरण को अगर गौर से देखिए तो लगता है, जैसे चोट पहुंचाई हुई धरती पहाड़, गंदी की हुई नदियां, तालाब , विभिन्न प्रकार के धुओं से भरा हुआ आकाश। प्रकृति फिर से खुद को रिकवर कर रही। जितने भी नदियाँ तालाब हैं, खुद को साफ कर लिया है। उन्हें हमारी जरूरत नहीं है। हमें उनकी जरूरत रही है सदियों से अपने जीवन को चलाने के लिए, खुद का अस्तित्व बचाने के लिए। हम मोहताज हैं उनके, वो हमारे नहीं।
( रांची में जन्मी लेखिका कवयित्री और सोशल एक्टीविस्ट हैं। पिछले 15 साल से आदिवासी /दलित /मुस्लिम महिलाओं के बीच जेंडर भेदभाव को समाप्त करने करने के लिए काम कर रही हैं। फिलहाल चम्बल के इलाके में कार्यरत।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। सहमति के विवेक के साथ असहमति के साहस का भी हम सम्मान करते हैं।