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चांद से पानी निकालने के मिशन में लगे हैं पलामू के आशीष रंजन, जानिए! पूरी कहानी

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महबूब आलम, पलामू: 

मंजिलें भी जिद्दी हैं, रास्ते भी जिद्दी हैं, देखते हैं कल क्या होगा, हौसले भी तो जिद्दी हैं। जी हां, हौसले की यही जिद इन्सान को सफलता की मंजिल तक जरूर पहुंचा देती हैं। ऐसी ही जिद थी हौसलों की पलामू के लाल डॉ आशीष रंजन कुमार की जिन्होंने अपनी काबिलियत से न सिर्फ अपने परिवार, समाज, जिले एवं राष्ट्र का ही नहीं अपितु समस्त मानव जाति का भी परचम लहराया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लिए डॉ लेस्ली की अगुवाई में उनकी टीम ‘शो मी आइस’ के साथ काम करते हुए चंद्रमा पर पानी की खुदाई (ड्रिल) तथा उसे निकालने में अहम भूमिका निभाई है। 

डॉ. आशीष की टीम को मिली है बड़ी कामयाबी
चंद्रमा की सतह से पानी कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस पर कार्य कर डॉ आशीष एवं उनकी टीम ने जो महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है वो निकट भविष्य में अंतरिक्ष की गहराइयों के लिए कई मिशन को संचालित करने में अहम भूमिका अदा करेगा जो अंतरिक्ष विज्ञान में एक मील का पत्थर साबित होगी। विदित हो कि डॉ आशीष एवं उनकी टीम ने अपने इस प्रोजेक्ट के सफलतापूर्वक संपन्न होते ही अब लाल ग्रह के नाम से मशहूर मंगल ग्रह पर भी पानी की खोज का कार्य प्रारम्भ कर दिया है। मानव जीवन के विकास के क्रम में ये एक बेहद महत्वपूर्ण, अतुलनीय एवं गेम चेंजर कदम है। पलामू की पृष्ठभूमि से उठकर नासा जैसी उत्कृष्ट अंतरिक्ष एजेंसी के लिए कार्य करते हुए एक अहम दायित्व को पूरा करना एक स्वप्न के साकार होने की भांति है।

पलामू में ही हुआ था डॉ. आशीष रंजन का जन्म
डॉ आशीष रंजन कुमार का जन्म पलामू के श्री गिरीश कुमार बिनोद के यहां हुआ। अपने माता-पिता के पांच सन्तानों में डॉ आशीष सबसे बड़े हैं। स्वभाव से मृदु भाषी तथा अध्ययन में बचपन से ही मेधावी रहे डॉ आशीष ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मेदिनीनगर से ही की है। नगर के प्रतिष्ठित डी ए वी पब्लिक स्कूल से 2003 में 95% अंकों के साथ दसवीं में सफलता प्राप्त की जो आगे भी निरंतर जारी रहा। सफल होने के तीन नियम-खुद से वादा, मेहनत ज्यादा और मजबूत इरादा को अपने गांठ बांध लिया और निकल पड़े अपनी अनूठी एवं प्रेरणादायी कहानी लिखने। संघर्षों से निखरती है शख्सियत यारों, जो चट्टानों से न उलझे वो झरना किस काम का..यह बात डॉ आशीष पर खरी उतरती हैं। इनके जीवन में प्रमुख बदलाव ISM-IIT धनबाद से माइनिंग इंजीनियरिंग में बी.टेक की पढ़ाई पूरी करने के साथ हुआ।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर हैं आशीष
उनके हौसले की जिद यहां कहां रूकने वाली थी। आगे की पढ़ाई करने वो अमेरिका चले गए। वहां केंटकी विश्वविद्यालय से अपनी पी. एच.डी. की जहां इनके शोध का विषय रहा खनन एवं डस्ट कंट्रोल। इसके तदोपरान्त इन्होंने दो वर्ष तक वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया और फिलवक्त अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में एम.एस. तथा पी.ई.के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। कहते हैं कि तूफ़ान भी अपने घुटने टेक देती है जब कश्तियां जिद पे होती हैं। दृढ़संकल्प, आत्मविश्वास एवं सच्ची लगन का ही परिणाम था कि उन्हें इतने महत्वपूर्ण भूमिका के उपयुक्त समझा गया और इसकी भागीदारी दी गई। अपने इस मिशन पर प्रकाश डालते हुए डॉ आशीष ने बताया कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर काफी पानी है जो तरल रूप में न होकर ठोस रूप में है, साथ ही साथ यहां का तापमान -185°C है।

चांद की सतह से पानी निकालना काफी चुनौतीपूर्ण
उन्होंने बताया कि इसकी सतह से पानी को निकालना एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। आगे बताते हुए वो कहते हैं कि चंद्रमा कि सतह से पानी का निकालना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इससे हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन को निकाल सकते हैं जिसका प्रयोग रॉकेट ईंधन के रूप में हो सकेगा जो अंतरिक्ष की गहराइयों में खोज को तीव्रता प्रदान करेगा। चंद्रमा की सतह पर हार्ड वैक्यूम होने की वजह से पानी के ख़त्म होने का खतरा रहता है जो वापस से प्राप्त नहीं किया जा सकता। डॉ आशीष का यह भी कहना है कि चंद्रमा की सतह पर खनन उपकरणों की स्थिति पृथ्वी के मुकाबले काफी बदल जाती है जो कि  बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उपकरणों की विश्वसनीयता अत्यंत ही कम हो जाती है, साथ ही इनका डिजाइन सैटेलाइट चित्रों के आधार पर ही हो पाता है। खराब हो जाने की परिस्थितियों में इनका निराकरण भी असंभव ही हो जाता है। चंद्रमा की सतह से किसी भी सामान का प्रक्षेपण करना पृथ्वी की तुलना में काफी तेजी से होता है जो गहरे अंतरिक्ष मिशनों के मद्देनजर बहुपयोगी है।

पलामू जिले से गहरा है आशीष रंजन कुमार का जुड़ाव
भले ही डॉ आशीष अपनों से मीलों दूर हैं पर अपने दिल में पलामू की मीठी यादों को संजोए बैठे हैं और अपने जिले के बच्चों एवं विद्यार्थियों के हरसंभव सहायता के लिए अत्यन्त तत्पर हैं। उनकी उपलब्धि एवं पलामू के लोगों के लिए सकारात्मक पहल भी बेहद गर्व की बात है और पलामू वासियों का स्नेह एवं आशीष सदैव डॉ आशीष के साथ बनीं रहेंगी ।