सूरज ठाकुर, रांची:
हेमंत सरकार रोजगार के वादे के साथ जोर-शोर से सत्ता में आई थी। चुनावी रैलियों में कहा था कि प्रत्येक साल पांच लाख नौकरियां दी जायेंगी। चुनाव बाद सवाल पूछा गया तो कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं ने कहा कि नहीं, ऐसा घोषणापत्र में कहां लिखा था कि हर साल पांच लाख नौकरियां दी जायेंगी। चलिए कोई बात नहीं। जनवरी 2021 में हेमंत सरकार ने कहा कि ये पूरा साल नियुक्तियों का वर्ष होगा। छह माह बीतने को हैं और एक भी नियुक्ति नहीं हुई। अलबत्ता पुरानी नियुक्ति प्रक्रिया ही रूकी हुई है। पंचायत सचिव की बहाली प्रक्रिया का ही उदाहरण ले लीजिए।
2019 को हो चुकी थी सारी परीक्षाएं और जांच
झारखंड में पंचायत सचिव और निम्नवर्गीय लिपिक के पदों पर नियुक्ति के लिए साल 2017 में अधिसूचना जारी की थी। ये पद गैर अनुसूचित जिलों और राज्यस्तरीय पदों के लिए निकाले गए थे। इन पदों पर भर्ती के लिए 21 जनवरी, 28 जनवरी और 4 फरवरी 2018 को लिखित परीक्षा ली गई। लिखित परीक्षा का परिणाम 23 फरवरी 2019 को जारी किया गया। लिखित परीक्षा में क्वालीफाई करने वाले अभ्यर्थियों का कौशल परीक्षण, हिंदी टाइपिंग टेस्ट और स्टेनोग्राफी टेस्ट 1 जुलाई से 8 जुलाई 2019 के बीच रांची में किया गया। इसका परिणाम जारी किया गया 20 अगस्त 2019 को। 3088 पदों पर नियुक्ति के लिए 4948 अभ्यर्थियों को डॉक्युमेंट वैरिफिकेशन के लिए बुलाया गया।
डॉक्युमेंट वैरिफिकेशन को भी 3 साल बीत गए
डॉक्युमेंट वैरिफिकेशन के लिए अभ्यर्थियो को झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग के कार्यालय में बुलाया गया। यहां 27 अगस्त 2019 से 31 अगस्त 2019 और 3 सितंबर 2019 से 7 सितंबर 2019 के बीच अभ्यर्थियों के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच की गई। नियुक्ति प्रक्रिया अंतिम चरण में थी। कभी भी परिणाम जारी किया जा सकता था लेकिन तभी इसमें एक बाधा आ गयी।
दरअसल, 14 जुलाई 2016 को तात्कालीन रघुवर सरकार नई नियोजन नीति लाई। इसमें झारखंड के सभी 24 जिलों को दो भागों में बांटा गया। 13 जिलों को अनुसूचित जिला कहा गया वहीं बाकी 11 जिलों को गैर अनुसूचित जिला। नियम था कि गैर अनुसूचित जिलों में तो कोई भी भारत के किसी भी प्रांत का व्यक्ति किसी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता है वहीं 13 अनुसूचित जिलों के लिए नियम बनाया गया कि वहां जिला स्तरीय पदों और ग्रुप सी तथा डी की नौकरियों के लिए केवल उसी जिले का निवासी आवेदन कर सकता है। हालांकि राज्यस्तरीय पदों के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी।
बीजेपी सरकार की नियोयन नीति का विरोध
इस नियम के खिलाफ पलामू की एक छात्रा झारखंड हाईकोर्ट पहुंच गयी। उसने कहा कि झारखंड का निवासी होने के बाद भी किसी सरकार द्वारा तय गैर अनुसूचित जिले का कोई छात्र क्यों अनुसूचित जिले में आवेदन नहीं कर सकता। झारखंड हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई की गई। 18 सितंबर 2019 को कोर्ट ने नई नियोजन नीति के आधार पर हो रही नियुक्तियों पर स्टे लगा दिया और तमाम बहाली रूक गयी। पंचायत सचिव और निम्नवर्गीय लिपिक पद पर हो रही नियुक्ति की अंतिम मेधा सूची भी रूक गई। हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया।
पंचायत सचिव अभ्यर्थियों ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका
पंचायत सचिव के अभ्यर्थियों ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की। कहा कि पंचायत सचिव सहित निम्नवर्गीय लिपिक के पदों पर नियुक्तियां 2016 की नियोजन नीति का हिस्सा नहीं है। ये तो राज्य स्तरीय पदों पर बहाली की जानी थी जो नियोजन नीति के आधार पर किसी भी जिले का अभ्यर्थी कहीं भी आवेदन कर सकता था। ये वैकेंसी स्वतंत्र थी। कोर्ट ने दलील सुनी।
सरकार ने भी माना कि हां ये उस नियोजन नीति का हिस्सा नहीं। हाईकोर्ट ने मामले में दो आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पंचायत सचिव और निम्न-वर्गीय लिपिक के गैर अनुसूचित जिले तथा राज्य स्तरीय पदों की अंतिम मेधा सूची झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आय़ोग अविलंब जारी करे। कर्मचारी चयन आयोग को 8 सप्ताह के भीतर मेधा सूची जारी करने का निर्देश दिया लेकिन मामला अभी तक लंबित है। नौकरी नहीं मिली।
मेधा सूची प्रकाशित करने संबंधी हरी झंडी नहीं मिली
मामले में झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग का कहना है कि अंतिम मेधा सूची प्रकाशित करने को लेकर सात बार चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार से परामर्श मांगा गया। मामले में राज्य सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग को जवाब देना था लेकिन मेधा सूची के प्रकाशन के संबंध में अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया। यही नहीं 21 फरवरी 2021 को विभाग ने आयोग को पत्र भेजकर परीक्षा संबंधी तमाम कार्यों पर रोक लगा दी। कर्मचारी चयन आयोग का कहना है कि अंतिम मेधा सूची तैयार की जा चुकी है लेकिन राज्य सरकार द्वारा हरी झंडी नहीं मिल रही। राज्य सरकार द्वारा अनुमति मिलते ही सूची जारी की जाएगी। मामले में सरकार की तरफ से केवल आश्वासन ही मिल रहा है। अभी कहा जा रहा है कि जल्द ही परिणाम जारी किये जायेंगे।
अभ्यर्थियों को सरकारी शब्दों की भूलभुलैया में घुमाया
सोचिए जरा। सरकारें नौकरियों का वादा करती है। युवा उम्मीद लिए वोट करते हैं। माता-पिता अपने जीवन की गाढ़ी कमाई बच्चों की पढ़ाई और फिर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं। अभ्यर्थी सरकार नौकरियों के लिए शहर के दबड़ानुमा कमरों में सालों खुद को घिसते हैं कि किसी दिन जिंदगी सही हो जायेगी। पहले तैयारी के नाम पर कोचिंग संस्थान और फिर आवेदन के नाम पर सरकार छात्रों से लाखों की फीस वसूलती है। सालों बाद भी परिणाम जारी नहीं किया जाता। सरकारी शब्दों की भूल-भूलैया में छात्रों को घुमाने की कोशिश की जाती है। ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है।
मामला केवल अभ्यर्थियों ही नहीं राज्य की प्रगति का भी
गैर अनुसूचित जिले तथा राज्य स्तरीय पंचायत सचिव व निम्नवर्गीय लिपिक पदों के अभ्यर्थियों ने मेधा सूची जारी करने की मांग को लेकर लंबा आंदोलन किया। मोरहाबादी, विधानसभा भवन, मुख्यमंत्री आवास से लेकर राजभवन तक में धरना और प्रदर्शन किया। लाठियां खाईं। अनशन किया लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। मामला केवल अभ्यर्थियों के भविष्य का नहीं है बल्कि राज्य की प्रगति का भी है। सरकारें जब राज्य को नंबर वन बनाने का वादा करती है तो शायद ये भूल जाती है कि उसके लिए प्रशासनिक मशीनरी चाहिए। बना पदाधिकारी, अधिकारी और कर्मियों के कामकाज कैसे होगा। पंचायतों में कर्मचारी ही नहीं होंगे तो ग्रामीण विकास की बातें सर्वथा बेमानी है। मुख्यमंत्री को विचार करना चाहिए।