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हूल दिवस विशेष: कैसे लड़े थे वीर सिद्धू-कान्हू-चांद और भैरव, जानिए! हूल क्रांति की पूरी कहानी

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सूरज ठाकुर, रांची: 

30 जून को पूरा झारखंड हूल दिवस के तौर पर मनाता है। इसी दिन भोगनाडीह गांव में हूल क्रांति का आगाज हुआ था। सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव ने इस दिन हूल क्रांति का बिगुल फूंका था। इसमें उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी थीं उनकी दो बहनें फूलो और झानों भी। हूल क्रांति की नींव भले ही 30 जून सन् 1855 को रखी गई हो लेकिन इसकी पृष्ठभूमि 90 साल पीछे 1765 में ही तैयार हो रही थी जब मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और ओड़िशा की दीवानी अंग्रेजों के सौंप दी थी। इसके बाद संघर्ष और शोषण का एक लंबा दौर चला जो आखिरकार हूल क्रांति के रूप में सामने आया।.

क्या हूल संताल आदिवासियों का सहज आक्रोश था! 
आमतौर को हूल को लोग महाजनी प्रथा के खिलाफ संताल आदिवासियों का सहज आक्रोश कहते हैं लेकिन ये पूरा सच नहीं है। एतिहासिक दस्तावेज इस बात की गवाही देते हैं कि हूल क्रांति महाजनी और साहूकारी प्रथा तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ संताल आदिवासियों का सुनियोजित संघर्ष था। एक रणनीति के तहत ये क्रांति की गई थी। क्रांति के नायक सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव की जन्मतिथि को लेकर कोई स्पष्ट एतिहासिक दस्तावेज नहीं मिलता। बस इतना पता है कि उनका जन्म मौजूदा बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह में हुआ था। दुमका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर प्रशांत सेन कहते हैं कि इसे संतालों का सहज आक्रोश कहना बेमानी होगी। स्थायी बंदोबस्त सहित संताल आदिवासियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किया गया कुठाराघात हूल आंदोलन की बड़ी वजह बना था। 

मौजूदा बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह में हुआ था इनका जन्म!
बरहेट के भोगनाडीह में सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव का जन्म हुआ था। यहीं उनकी बहनें फूलो और झानों का जन्म हुआ। पिता का नाम चुन्नी मुर्मू या मांझी था। सभी भाई बहनों का बचपन यहीं बीता। यहीं वे बड़े हुए और यहीं से उनको क्रांति की प्रेरणा मिली। ये मकान हूल क्रांति के योद्धाओं की याद दिलाता है। याद दिलाता है कि कैसे वे स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिए संताल वीरों ने आंदोलन किया। आने वाली पीढ़ियां भी इससे प्रेरणा लेंगी। 

राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे थे संताल आदिवासी
खैर। वापस हूल क्रांति पर लौटते हैं।  कहा जाता है कि राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में संतालों को बसाया गया। उन्हें जंगल को साफ करके खेती करना सिखाया गया। संताल आदिवासी झूम खेती में पारंगत थे। वे जंगल को साफ करके उस जमीन को खेती लायक बना लेते थे। चावल और मक्के की अच्छी खेती हो रही थी। सबकुछ अच्छा चल रहा था लेकिन सबकुछ हमेशा के लिए अच्छा नहीं रहा। इस पूरे मामले में अचानक भागलपुर के तात्कालीन कलेक्टर ऑगस्टस क्वीसलैंड की एंट्री हुई और फिर सबकुछ बदल गया। प्रोफेसर प्रशांत सेन बताते हैं कि अंग्रेजों पर स्थायी बंदोबस्त के तहत लगान की दर थोपी गई। पैसे में लगान चुकाने का दवाब बनाया गया। पहले जहां मांझी या प्रधान लगान अधिकारी हुआ करता थे अब उनका  स्थान टैक्स कलेक्टर, पुलिस और दूसरे अंग्रेज पदाधिकारियों ने ले लिया जिनकी संतालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी। 

ऑगस्टस क्वीसलैंड ने फ्रांसिस बुकानन को सर्वेक्षण के लिए भेजा
सन 1810 में भागलपुर के तात्कालीन कलेक्टर ऑगस्टस क्वीसलैंड ने अंग्रेज अधिकारी फ्रांसिस बुकानन को राजमहल की पहाड़ियों का सर्वेक्षण करने के लिए भेजा। फ्रांसिस बुकानन ने यहां आदिवासी बस्तियां देखी। देखा कि व्यापक पैमाने पर चावल की खेती हो रही है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को संतालों में नई संभावना दिखी। दरअसल, 1780-1790 के दशक में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। लाखों-लाख लोग मारे गये। खाद्यान्न की भारी कमी हो गई। कंपनी सरकार को लगा कि उसकी क्षतिपूर्ति यहां से की जा सकती है। सन् 1836 में राजमहल की पहाड़ियों के साथ-साथ पूरे संताल परगना को अंग्रेजों ने दामिन-ए-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया। 

संताल आदिवासियों पर स्थायी बंदोबस्त प्रणाली थोपी गई थी
यहां स्थायी बंदोबस्त प्रणाली लागू कर दी गई। स्थायी बंदोबस्त प्रणाली में उपज हो या ना हो, लगान की एक तय रकम जमा करानी ही होती थी। लगान भी नकदी में जमा कराना होता था। इसका परिणाम ये हुआ कि संतालों को उपज नहीं होने पर लगान की दर चुकाने के लिए महाजनों और साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था। ऋण के बदले महाजन उनसे सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेते। उनकी जमीन हड़प ली जाती। उनके घर की महिलाओं को उठा लिया जाता। उनको मारा पीटा जाता। जुल्म की इंतिहा हो गई थी। सिद्धू कान्हू ये सब देख रहे थे। सुन रहे थे। संताल आदिवासियों में भी रोज रोज के जुल्म से आक्रोश बढ़ता जा रहा था। और फिर तारीख आई 30 जून 1855 की। दुनिया बाबा नाम के शख्स ने सिद्धो को आबुआ राज की संकल्पना के साथ संघर्ष के लिए प्रेरित किया। 


30 जून 1855 को संताल वीरों ने किया था क्रांति का आगाज
30 जून 1855 को भोगनाडीह के एक गांव में सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव ने एक सभा बुलाई। कहा जाता है कि उसमें 10 हजार से भी ज्यादा की संख्या में आदिवासी पारंपरिक हथियारों के साथ जमा हो गये। सिद्दो कान्हू ने उनसे कहा कि अब बर्दाश्त की हद पार हो चुकी है। हमें लड़ना होगा। हक के लिए। स्वाधीनता के लिए। संघर्ष करना होगा स्वाभिमान के लिए। यहीं हूल क्रांति का बिगुल फूंक दिया गया। 


भोगनाडीह में दारोगा सहित बंगाली महाजनों की हत्या कर दी
भोगनाडीह में संतालों पर जुल्म की पहली कड़ी था स्थानीय दारोगा महेश लाल दत्त। महाजनों और साहूकारों की सरपरस्ती में दारोगा महेश लाल दत्त आदिवासियों पर बहुत जुल्म ढाता। क्रांति की शुरुआत में सबसे पहले कान्हू ने दारोगा महेश लाल दत्त की हत्या कर दी। इसके बाद पंचकठिया के पांच बंगाली महाजनों की हत्या आदिवासी क्रांतिकारियों ने कर दी। इसके बाद आमड़ापाड़ा में महाजन कीनाराम की हत्या कर दी गई। भोगनाडीह से शुरू हुई हूल क्रांति की आग जल्दी ही साहिबगंज, भागलपुर, कहलगांव, पाकुड़, आमड़ापाड़ा, प्यालापुर, संग्रामपुर और जामताड़ा तक फैल गया। 

संताल परगना में सबसे व्यापक था हूल क्रांति का प्रभाव
इस आंदोलन का सबसे ज्यादा व्यापक प्रभाव संताल परगना में था। गुरिल्ला युद्ध नीति में पारंगत संताल क्रांतिकारी वीरों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों को कड़ी टक्कर दी। सरकारी कार्यालयों को फूंक दिया। शोषण  का प्रतीक बने दस्तावेजों को जला दिया। महाजनों और साहूकारों की कोठियों पर हमला किया गया। अंग्रेज अधिकारियों के बंगले जला दिये। भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्वीसलैंड को राजमहल में मौजूद सिंघी दालान में शरण लेनी पड़ी। अंग्रजों को इन संताल आदिवासियों ने अपनी रणनीति से काफी परेशान किया। नुकसान पहुंचाया। 

हूल क्रांति में सूचना तंत्र का जिम्मा महिलाओं के जिम्मे था
हूल क्रांतिकारियों की सूचना तंत्र को मजबूत बनाया था आदिवासी महिलाओं ने। आदिवासी महिलाएं क्रांतिकारियों को हथियार और रसद की आपूर्ति करतीं। अहम सूचनाएं मुहैया करवातीं। इस दल का नेतृत्व कर रही थीं हूल क्रांति के नायक सिद्धो-कान्हू की बहनें फूलो और झानो। 


ईस्ट इंडिया कंपनी ने छल और कपट से किया क्रांति का दमन
इस बीच लड़ाई में खुद को कमजोर पड़ता देख अंग्रेजों ने अपनी नीति बदली। महाजनों और साहूकारों के लठैतों को आंदोलनकारियों की खुफिया सूचना हासिल करने का जिम्मा सौंपा। रणनीति ऐसी बनाई की आंदोलनकारियों को जंगली और पहाड़ियों का इलाका छोड़कर मैदानी इलाकों में आना पड़ा। अब सीधी लड़ाई होने लगी। पाकुड़ में कैप्टन मार्टिलो ने एक टॉवर का निर्माण करवाया। इसमें कई सारे सुराख बनाये गये। ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही इसके पीछे छुपकर आंदोलनकारियों पर गोलियों की बौछार करने लगे। अंग्रेजों की तोप और अत्याधुनिक बंदूकों के आगे आंदोलनकारियों के तीर धनुष, फरसा, टांगी, दरांती जैसे हथियार कमजोर पड़ने लगे। सैकड़ो की संख्या में संताल वीर मारे जाने लगे। लेकिन वे लड़ते रहे। स्वाभिमान और आबुरा राज के लिए। 

भोगनाडीह से जामताड़ा तक था हूल क्रांति का व्यापक प्रभाव
लड़ाई का दायरा बढ़ता जा रहा था। साहिबगंज, भागलपुर, आमड़ापाड़ा, जामताड़ा, कहलगांव, रानीगंज, प्यालापुर और संग्रामपुर तक लड़ाई होने लगी थी। संग्रामपुर की लड़ाई में चांद और भैरव अपने हजारों साथियों के साथ शहीद हो गये। एक दिन जब कान्हू भोगनाडीह में ही युद्धनीति बना रहे थे, किसी ने मुखबिरी कर दी। उनको धोखे से मार डाला गया। सिद्धो को जामताड़ा के पास उपरबंधा गांव से गिरफ्तार किया गया। उनको भोगनाडीह के पास पंचकठिया में लाकर फांसी दे दी गयी। हूल आंदोलन का दमन कर दिया गया। लेकिन क्रांति की जो लौ उन्होंने जगाई थी वो ज्वाला बन चुकी थी। आने वाले वक्त में हूल आंदोलन ने संताल आदिवासियों को क्रांति के लिए प्रेरित किया। स्वाधीनता और आबुरा राज के लिए संघर्ष के लिए प्रेरित किया।