logo

रांची के हुसैन कच्छी जब कराची में गीता से मिले थे….

6268news.jpg
हुसैन कच्छी
आज सुबह मिली एक खबर से दिन की शुरुआत हुई। हालांकि शाम तक खबर वहम में तब्दील हो गई। खबर थी कि मां से बिछ़डी गीता को अपना घर-आंगन मयस्सर हो गया है। जेहन मेरा 2015 के दिनों में लौट गया। तब जुलाई में सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाईजान की रिलीज के साथ गीता की कहानी हर जुबान पर थी।  मैं अक्सर अपने रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान आता-जाता रहा हूं। तब भी कराची पहुंचा था। और गीता से मिलने की हसरत बेचैन कर चुकी थी। क्योंकि उड़ती-उड़ती कई खबरें पढ़ चुका था कि उसके रिश्तेे झारखंड से भी रहे हैं। गीता से मिलने का इरादा कर लिया और पहुंच गए ईधी वेलफेयर ट्रस्ट।

प्यारी सी सांवली सलोनी गीता मंद-मंद मुस्कुराती
ईधी वेलफेयर ट्रस्ट के फैसल दोस्तं रहे हैं। उन्हें फोन  किया। उसी शाम उन्होंने बुलवा लिया। साल 2015 और तारीख थी 13 अगस्तं। बेहद प्यारी सी सांवली सलोनी बच्ची़ गीता सामने थी, मंद-मंद मुस्कुराती हुई। जब उसे पता चला कि मैं भारत से हूं तो भावुक हो गई गीता। मेरे कंधे पर सर रखकर कुछ  कहने की कोशिश करने लगी। लेकिन यह एहसास था। न वो बोल सकती है, न सुन सकती है। उसके इशारों ने बताया कि वो अपने देस जाना चाहती है। अपने मां-बाप, भाई-बहन से मिलना चाहती है। अपने आंगन में उसी तरह फुदकना चाहती है।



यह भी पढ़िये
दो दिनों तक मैप खोलकर बैठे रहे गीता के संग
हमारे साथ  भांजे नासिर और नादिर थे, जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स हैं। उनके लैपटॉप पर हम लोग यानी फैसल ईधी, बिलकिस ईधी गीता के साथ दो दिनों तक मैप खोलकर सिर जोड़कर बैठे। जब गीता नक्शे में कभी किसी इलाके को देखक ठहर जाती, इशारे से कोई गांव-गलियारा बताती तो हम सभी उसके दर्द में पिघलने लगते। हमारी परेशनी का सबब रहता कि गीता की दिक्कत कैसे हल की जाए क्योंकि वो ठीक-ठीक जगह नहीं पहचान पाती और न बता पाती थी। 

गीता के लिए बनाया गया था मंदिर 
गीता को यह भी समझ और समझा पाना मुश्किल था कि आखिर वो पाकिस्तान कैसे पहुंच गई। कैसे इंडो-पाक बॉर्डर पर पाक रेंजर के संरक्षण में वो पहुंची। उन लोगों ने गीता को मौलाना अब्दुल सत्तार ईधी से संपर्क किया, ताकि बच्ची महफूज रह सके। लड़की उनके पास कराची भेज दी गई। मुझे बिलकिस ईधी ने बताया था कि लड़की का नाम रखना जरूरी था। पहले इस्लामी नाम सामने आया। लेकिन जब लड़की दूसरी लड़कियों के साथ रहने लगी तो उसकी आदत और कल्चर  उन्हें हिंदु संस्कृ ति से मेल खाती लगी। फिर उन्होंने फातिमा की जगह उसका नाम गीता रख दिया। फिर उसकी परवरिश हिंदू तौर-तरीके से की जाने लगी। गीता के लिए मंदिर बना दिया गया। जहां भगवान की मूर्ति और फोटो लगाए गए। गीता भी मगन होकर पूजा-पाठ करती। 



बेटी की तरह दी गई थी बिदाई
गीता मुझसे काफी घुल मिल गई थी। उसने मुझे अपना कमरा और मंदिर भी दिखाया था। जब मैंने आरती और पूजन को एक्शन में बताया तो वो बहुत खुश हुई। हमारे साथ ईधी फाउंडेशन की भी चाहत रही कि गीता अपने वतन चली जाए। उसके घर वाले मिल जाएं। हमने रांची के बिग बाजार से खरीदा सूट का तोहफा उसे दिया था। कुछ ही दिनों में भारत-पाक के बीच समझौते के तहज गीता आखिर हिंदुस्ताीन पहुंच गई। बिलकिस और उनके बच्चे ही लेकर भारत आए थे। बिदाई बिल्कुल बेटी के घर से जुदा होने की तरह थी। उसके शेल्टर होम से जाते वक्त समूचा इलाका टूट पड़ा था। साथी लड़कियां रो रही थीं। सभी ने तोहफे दिए। बिलकिस ने खास सूट उसके लिए सिलवाए थे। 

इंदौर पहुंचकर भी नहीं भूली गीता
हिंदुस्ताान आने पर गीता को इंदौर के एक महिला आश्रम में रखा गया था। मैंने खुद दो बार वहां के मैनेजर से फोन कर उसका हाल-चाल पूछा था। मैनेजर ने जब मेरी तस्वीूर गीता को दिखाई तो उसने पहचान लिया था। इशारों में बताया कि ईधी फाउंडेशन में मिले थे।
रब से दुआ है कि गीता को उसका चांदनी भरा आंगन जल्द मिल जाए।

(रांची निवासी लेखक हुसैन कच्छी सोशल एक्टीेविस्ट और उर्दू के लेखक-कवि हैं। रिश्‍तेदारों से मिलने इनका कराची आना-जाना लगा रहता है।)