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भारत की स्वदेशी चिकित्सा पद्धति और बाबा रामदेव

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सुभाष चन्द्र कुशवाहा, लखनऊ:
हाकिम अब्दुल मजीद खां ने 1883 में मदरसा तिबिया की दिल्ली में स्थापना की। जुलाई 1889 में इसके उदघाटन के साथ ही यूनानी चिकित्सा पद्धति को गति मिली। इस स्कूल में यूनानी पद्धति के साथ-साथ एलोपैथिक का ज्ञान भी कराया जाने लगा। मजीद के बाद, छोटे भाई,  हाकिम अजमल खां ने इस स्कूल के आधुनिकीकरण का काम किया। अजमल खां ने इंडियन मेडिसिन कंपनी की स्थापना की। बाद में उनके प्रयास से, 1911 से तिबिया स्कूल के दवाखाना का प्रबंध अंजुमन-ए-तिबिया यानी मेडिकल एसोसिएशन करने लगी।

तब बाबा रामदेव नहीं थे
उस समय बाबा रामदेव नहीं थे और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की हालत बहुत खराब थी। हाकिम अजमल खां ने यूनानी और स्वदेशी चिकित्सा पद्धति को एक मंच पर लाकर आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों और नए अनुसन्धानों से परिचय कराया था। उन्होंने यूनानी, आयुर्वेदिक और ऐलोपैथिक में समन्वय स्थापित किया, जिससे ब्रिटिश सरकार ने 'हजिक-उल-मुल्क' की उपाधि दी थी। जिसे उन्होंने 1920 ने तुर्की के खलीफा प्रसंग पर विरोध स्वरूप लौटा दिया था। 21 नवम्बर 1911 को बम्बई विधान परिषद ने एक विधेयक पास किया, जिसके द्वारा उन्हें चिकित्सक नहीं मानना था जो यूरोप या भारत के मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से डिग्री न हासिल किये हों। इस कानून से पूरी स्वदेशी चिकित्सा पद्धति जिसमें यूनानी और आयुर्वेदिक, दोनों के चिकित्सक बाहर हो गए।

अजमल खान ने किया देशभर का दौरा, देशी चिकित्सा को दिलाया मुकाम
अजमल खां ने देश का दौरा किया। यूनानी और आयुर्वेदिक वैद्यों की बैठक कर सरकारी विधेयक का विरोध शुरू किया। उन्होंने कहा कि बनवारीलाल आयुर्वेदिक पाठशाला, दिल्ली, मदरसा तिबिया, दिल्ली, पीलीभीत और जयपुर के आयुर्वेदिक स्कूलों के चिकित्सकों को भी बम्बई मेडिकल काउंसिल की सदस्यता के योग्य समझा जाए। हकीम साहब ने 21 जनवरी 1912 के पत्र द्वारा सरकार के सामने दिल्ली में आयुर्वेदिक और यूनानी तिबिया कालेज की स्थापना का खाका प्रस्तुत किया जिसे नवम्बर में  प्रस्ताव पारित कर अमली जामा पहना दिया गया। उन्होंने पाठ्यक्रम को तैयार करने में यह प्रस्ताव रखा कि देसी चिकित्सा पद्धति पूरी तरह से भारतीय चिकित्सा की आवश्यकताओं के अनुरूप होगी। आगे बम्बई, बंगाल, बिहार, उड़ीसा और पंजाब विधान परिषदों में यह प्रस्ताव रखे गए मगर सरकार ने माना नहीं। 15 मार्च 1916 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल में  खान बहादुर मीर असद खां द्वारा इस प्रस्ताव को पेश किया गया। सरकार पर दबाव बना और आखिर सरकार ने इसे स्वीकार किया।

हरिद्वार में खोले गए आयुर्वेदिक कालेज 
सरकार ने एक औषधि निर्माण समिति बनाया जिसका काम देशी पद्धति की दवाओं की गुणवत्ता की जांच करनी थी। इससे अजमल खां को कोई आपत्ति न थी और 6 वर्षों के संघर्ष के बाद उन्होंने यूनानी और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में सरकार को विश्वास दिला दिया। तब बाबा रामदेव न थे जो चूरन, चटनी के साथ-साथ फ़टे जीन्स भी बेचने लगे हैं। तब यही हाकिम अजमल खां थे जिन्होंने, औषधि निर्माण समिति के प्रतिकूल निर्णय पर भी डिगे नहीं और स्वदेशी चिकित्सा प्रणाली को मान्यता दिला दी। संयुक्त प्रान्त सरकार ने बोर्ड ऑफ इंडियन मेडिसिन की स्थापना की. मद्रास और बिहार की सरकारों ने तिबिया कॉलेज खोले। सरकार द्वारा लखनऊ में तिबिया कालेज, हरिद्वार में आयुर्वेदिक कालेज खोले गए। इन्हें वित्तीय सहायता मिलनी शुरू हुई।

तब चिकित्सा सेवा रही, व्यापार नहीं
तो इस प्रकार स्वदेशी चिकित्सा पद्धति को अजमल खां द्वारा न केवल बचाया गया, अपितु इसे आम जनता के लिए उपलब्ध कराया गया। बिना पैसा लिए लोगों का इलाज किया गया। ब्रिटिश कानून के अंतर्गत वैद और हकीम बचे रहे। तो बाबा रामदेव, आज जो गरज रहे हैं, यह अधिकार जिनसे उन्हें मिला है, उसका नाम भी नहीं जानते होंगे। यह व्यापारी बाबा, स्वदेशी चिकित्सा पद्धति के संरक्षक नहीं, दोहन करने वाले हैं. ऊपर से गेरुआ वस्त्र, राष्ट्रवाद, देशी बनाम स्वदेशी का फर्जी नारा, जो चीन और न्यूजीलैंड से आयातित वस्तुओं को भी स्वदेशी बनाने का हुनर रखते हैं और कोरोना से अपने लोगों की हिफाजत न कर पाने के बावजूद, कोरोनिल बेच कर लाभ कमाते हैं और राष्ट्रभक्त कहलाते हैं, उन्हें अजमल खां का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने हरिद्वार में आयुर्वेदिक कालेज खुलवाया।


(यूपी सरकार की उच्च सेवा से रिटायर्ड अफसर सुभाष चंद्र कुशवाहा लेखक और संस्कृतिकर्मी हैं। आशा, कैद में है जिन्दगी, गांव हुए बेगाने अब (काव्य संग्रह), हाकिम सराय का आखिरी आदमी, बूचड़खाना, होशियारी खटक रही है, लाला हरपाल के जूते और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह) और चौरी चौरा विद्रोह और स्वाधीनता आन्दोलन (इतिहास) समेत कई पुस्तकें प्रकाशित। कई पत्रिकाओं और पुस्तकों का संपादन। संप्रति लखनऊ में रहकर स्वतंत्र लेखन)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।