विपिन कुमार
शर्मा
एक लंबा दौर रहा है जब बिहार शिक्षा और विद्यार्थियों की वजह से जाना जाता रहा है। बिहार में इस विद्या-धन के सिवा और था भी क्या? लेकिन पिछले तीस-चालीस सालों में बिहार के महान नेता नागरिकों को भेड़ बनाने के उद्देश्य से धीरे-धीरे शिक्षा को चारे की तरह चरते चले गए। आज बिहार शिक्षा के नाम पर एकदम बंजर हो चुका है।
वो बचपन की पाठशाला,गुरु का सम्मान
मुझे बचपन का अपना गाँव आज तक याद है... शाम ढलते ही ऐसी कोई ड्योढ़ी (छोटे-बड़े घर अथवा झोपड़ी का सबसे बाहरी हिस्सा) नहीं होती थी जहाँ एक-दो लालटेन न जल रही हो और वहाँ बच्चों अथवा किशोरो का समूह पढ़ने में तल्लीन बैठा न दिख रहा हो। शाम ढलने के बाद न पढ़ना पाप या अपराध सरीखा लगता था। उस दौर में शिक्षकों का ऐसा सम्मान था कि बड़े-बूढ़े भी गुरुजी को प्रणाम करने में होड़ लेते थे। मेरी पढ़ाई बचपन में ऐसे ही एक ‘पाठशाले’ में शुरू हुई थी जिसमें गुरुजी किसी दलित जाति के थे। बालदेव गुरु जी। पिटाई करने में कसाई को भी पछाड़ सकते थे। उनका एक हाथ पोलियो के कारण अपाहिज हो गया था। इसीलिए बच्चे पीठ पीछे लूल्हा गुरुजी कहते थे। लेकिन किसी की भी इतनी मजाल नहीं होती कि पीटते वक़्त गुरुजी की छड़ी या पोलियोग्रस्त हाथ को रोक ले। अभिभावक तो बिना पिटाई के पढ़ाई को पढ़ाई समझते ही नहीं थे। वह दौर छात्रों के पिटने का था। कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक को पीट कर घर में प्रवेश कर जाता, ऐसा कोई घर नहीं था। बहुत बाद तक मैं जब गाँव जाता था तो बाबा मुझे बालदेव गुरूजी को प्रणाम करवाने ले जाते थे।
इंग्लिश मीडियम के चक्रव्यूह के बावजूद डॉक्टर-इंजीनियर
वह ज़माना था जब बिहार के विद्यार्थी इंग्लिश मीडियम के चक्रव्यूह के बावजूद डॉक्टर-इंजीनियर से नीचे कुछ होने को अपमान समझते थे। बाद में वे यूपीएससी और आईआईएम में भी झंडे गाड़ते रहे। पहले से पड़ी मजबूत बुनियाद के कारण ही कथित जंगल राज के दौर में भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई थी। किंतु जब राज्य और देश के नियामक ही ठान लें तो कैसी भी व्यवस्था को बर्बाद किया जा सकता है।
शिक्षक को कक्षा से बाहर लाकर पीटा जाना
बहरहाल, पिछले 26 मार्च को बिहार बंद के दौरान तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे एक शिक्षक दिव्यानंद को कक्षा से बाहर लाकर पीटा गया। पीटने वाले राजद के छात्र संगठन के छात्र थे। यह एक बड़ी खबर बननी चाहिए कि कोई शिक्षक न पढ़ाने की वजह से नहीं, बल्कि पढ़ाने के कारण छात्रों द्वारा पीटा गया है। बिहार कहाँ से कहाँ पहुँच चुका! विचार करने की ज़रूरत यह भी है कि दिव्यानंद क्या दीवार को पढ़ा रहा था? अगर विद्यार्थी पढ़ना चाहता हो तो क्या शिक्षक मना कर सकता है? क्या वह शिक्षक का धर्म होगा? नेता की नेतागिरी युनिवर्सिटी कैम्पस के बाहर चलनी चाहिए, कैम्पस के भीतर क्या हो इसे या तो शिक्षक तय करेंगे या विद्यार्थी। उसे गुंडों के हवाले नहीं किया जा सकता।
क्या सियासी दल के गुंडों को कुछ भी करने का अधिकार प्राप्त हो गया?
अभी हाल के ही बिहार चुनाव में राजद के साथ केवल कांग्रेस ने ही नहीं, वामपंथी पार्टियों ने भी गठबंधन किए थे। क्या एक शिक्षक के साथ हुए इस दुर्व्यवहार की जवाबदेही इन दलों की कुछ कम है? लेकिन तेजस्वी यादव सहित इन दलों के भी किसी नेता ने सहायक प्रोफेसर दिव्यानंद के साथ हुए इस आपराधिक घटना पर कोई टिप्पणी या कोई ट्वीट नहीं किया है। मुझे नहीं मालूम कि कन्हैया कुमार ने इस पर कोई बयान दिया है या नहीं? इससे पहले केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के भी एक सहायक प्रोफेसर के साथ भाजपा के गुंडों ने मार-पीट की थी, तब भी राजनीतिक स्तर पर कुछ खास हलचल नहीं हुई थी। भाजपा और संघ की दंगाई छवि तो सर्वज्ञात है ही, राजद और लालू यादव भी अपनी इसी आपराधिक छवि के कारण असमय ही बिहार की राजनीति में अप्रासंगिक हो गए। दूसरी बात, कि बिहार में भाजपा और जेडीयू की सरकार है। क्या नीतीश कुमार भी इस मुद्दे पर राजद गुंडों के साथ खड़े हैं? क्या तेजस्वी यादव ने बिहार बंद का एलान कर दिया तो उसकी पार्टी के गुंडों को कुछ भी करने का अधिकार प्राप्त हो गया?
नागरिक समाज ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त कैसे कर रहा है?
और सबसे बड़ी बात कि बिहार का नागरिक समाज ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त कैसे कर रहा है? अपने शिक्षकों का सम्मान करने वाला समाज इतना संवेदनहीन और अविवेकी कैसे हो सकता है? और वे माँ-बाप कैसे हैं जिनके बच्चे अपने शिक्षक को पढ़ाने के कारण पीट रहे हैं? वे बच्चे अब तक अपने माँ-बाप के साथ रह कैसे रहे हैं? जो समाज अपने शिक्षकों और विद्वानों का सम्मान करना नहीं जानता उसका न वर्तमान होता है और न भविष्य! यह अकारण नहीं है कि बिहार के लोग अब ज्यादातर भूत की बातें करना पसंद करते हैं।
(मूलत: बिहार के रहने वाले विपिन कुमार शर्मा
की रचनाएं देश के सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। दो किताबें बहेलिए (कहानी
संग्रह) और अमलतास (कविता संग्रह) प्रकाशित। फ़िलहाल मुम्बई में रहकर टीवी और फिल्म
के लिए लेखन।)
नोट: यह लेखक के
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