मनोहर महाजन, मुंबई:
"...तेरा बाप राका..(जिस देश में गंगा बहती है)", "..ओए भगत सिंह ये पारत-माता की हुदीए?..(शहीद)", "..राशन पर भाषण बहुत हैं,भाषण पर कोई राशन नहीं..(उपकार)", "..शताले शताले मेरा भी समय आयेगा..(कश्मीर की कली)", "..शेर खान काले का धंधा करता है, लेकिन ईमानदारी से..(जंजीर)", "..राम ने हर युग में जन्म लिया है, पर लक्ष्मण फिर भी पैदा नहीं हुआ..(उपकार)...।" यह हिंदुस्तानी फिल्मों के वो संवाद हैं, जो अमर हो चुके हैं। ''जिस देश में गंगा बहती है'' के 'डाकू राका' का किरदार निबाह रहे हों या "उपकार" के 'मलंग चाचा' बने हों या "जंजीर" के अक्खड़-पठान 'शेरखाँ'..जिनका 'चेहरा' हर किरदार को निभाते हुए ये एहसास छोड़ जाता है कि उनके बिना इस किरदार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ अपनी गम्भीर आवाज़ और अपने बेमिसाल अभिनय से हर भूमिका में 'प्राण' फूँक देनेवाले 'प्राण साहब' की।
आइये परिचित हों प्राण साहब की कुछ जानी-अनजानी बातों से
12 फ़रवरी,1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में प्राण साहब का जन्म हुआ। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। दिल्ली में उनका परिवार बेहद समृद्ध था। वे बचपन से ही पढ़ाई में होशियार रहे,खास तौर पर गणित में बहुत कम लोग जानते होंगे कि एक सशक्त और सफल अभिनेता के बचपन का स्वप्न बड़े होकर एक फोटोग्राफर बनाना था। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली की एक कंपनी 'ए दास & कंपनी' में एक अप्रेंटिस के तौर पर काम भी किया। पर उनका इंतजार तो भारतीय सिनेमा जगत कर रहा था।
पान की दुकान पर खड़े प्राण को डायरेक्टर ने पंसद कर लिया
1940 में लेखक मोहम्मद वली ने जब पान की दुकान पर प्राण को खड़े देखा तो पहली नजर में ही तय कर लिया कि ये उनकी पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” हीरो वही होंगे।उन्होंने प्राण को इसके लिए तैयार किया। ये फिल्म बेहद सफल रही। 1942 में फिल्म 'खानदान' से मिली। दलसुख पंचौली की इस फिल्म में उनकी नायिका नूरजहां थीं।बंटवारे से पहले प्राण ने 22 फिल्मों में नकारात्मक भूमिका निभाई। वे उस समय के काफी चर्चित 'विलेन' बन चुके थे। आज़ादी के बाद उन्होंने लाहौर छोड़ दिया और 22 फिल्मों के अनुभव के साथ वे मुंबई आ गए। यह उनके लिये संघर्ष का समय था। काफी संघर्ष के बाद लेखक-सादत हसन 'मंटो' और अभिनेता-श्याम की सहायता से प्राण को बाम्बे टाकिज की फिल्म 'जिद्दी' में अभिनय का अवसर मिला। इसी फिल्म में किशोर कुमार को भी बतौर गायक ब्रेक मिला था। उसके बाद 'गृहस्थी' ,प्रभात फिल्म्स की 'अपराधी', वली मोहम्मद की 'पुतली' जैसी फिल्में काफी महत्वपूर्ण रही। पर इस दशक की सभी फिल्मों में अभिनेता प्राण नकारात्मक भूमिकाओं में नजर आए।
दिलीप, देवानंद और राजकपूर के साथ जुगलबंदी
1955 में दिलीप कुमार के साथ आजाद, मधुमती, देवदास, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम और आदमी नामक फिल्मों के किरदार महत्वपूर्ण रहे तो देव आनंद के साथ मुनीमजी (1955), अमरदीप (1958) जैसी फिल्में पसंद की गई। राज कपूर अभिनीत फिल्में 'आह', 'चोरी-चोरी', 'छलिया', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'दिल ही तो है' जैसी फिल्में हमेशा याद की जाएंगी। फिल्म उद्योग में चालीस की उम्र में भी प्राण की डिमांड कम नहीं हुई। प्राण ने फिल्म 'हलाकू' में मुख्य अभिनेता का बड़ा सशक्त किरदार निभाया। साठ के दशक के बाद भी प्राण का अभिनेता देवानंद के साथ सफल जोड़ी बनी रही। बात चाहे 'जॉनी मेरा नाम', 'वारदात' या 'देस परदेस' की करें, ज्यादातर सभी फिल्में दर्शको को बेहद पसंद आईंं। हास्य अभिनेता किशोर कुमार और महमूद के साथ भी उनकी फिल्में पसंद की गईं। किशोर कुमार के साथ फिल्म 'नया-अंदाज', 'आशा, 'बेवकूफ' 'हाफ-टिकट' ki,'मन-मौजी' ,'एक राज', 'जालसाज' जैसी यादगार फिल्में हैं तो महमूद के साथ 'साधू और शैतान', 'लाखों में एक' प्रमुख फिल्में रहीं।
मनोज कुमार से शशि कपूर और बिग बी के संग जोड़ी
1967 में अभिनेता मनोज कुमार की फ़िल्म के मलंग चाचा के किरदार ने प्राण का चरित्र किरदार की तरफ झुकाव बढाया। इसके बाद 'शहीद', 'पूरब और पच्छिम', 'बे-ईमान' ,'सन्यासी',' दस नम्बरी', 'पत्थर के सनम' में महत्वपूर्ण किरदार निभाए। अभिनेता शशि कपूर के साथ भी उनकी कई फिल्में जैसे 'बिरादरी', "चोरी मेरा काम' ,'फांसी','शंकर दादा', 'चक्कर पे चक्कर','राहू केतु','अपना खून' और 'मान गए उस्ताद' जैसी फिल्में बेहद सफल रहीं। हमजोली',परिचय,आंखों-आंखों में, झील के उस पार, जिंदादिल, ज़हरीला इंसान, हत्यारा,चोर हो तो ऐसा, धन दौलत,जानवर (1983), राज-तिलक,इन्साफ़ कौन करेगा, बेवफाई, इमानदार,सनम बेवफा, '1942 ए लव स्टोरी', फिल्मों में चरित्र अभिनेता के तौर पर नजर आये। अमिताभ बच्चन के अभिनय कैरियर को बदलने वाली फिल्म 'जंजीर' के किरदार विजय के लिये निर्देशक प्रकाश मेहरा को प्राण ने सुझाया था। इस किरदार को पहले देव आनंद और धर्मेन्द्र ने नकार दिया था। प्राण ने अमिताभ की दोस्ती की खातिर इसमें 'शेरखान' का किरदार भी निभाया था. इसके बाद अमिताभ बच्चन के साथ डॉन, अमर-अकबर-अन्थोनी, मजबूर, दोस्ताना, नसीब, कालिया और शराबी जैसी फिल्में महत्वपूर्ण हैं।

बढती उम्र के सबब नब्बे दशक में अभिनय से बनाने लगे दूरी
नब्बे दशक की शुरुआत होते ही प्राण साहब फिल्मों में अभिनय के प्रस्ताव बढती उम्र और स्वास्थ्य के चलते अस्वीकार करने लगे लेकिन करीबी अमिताभ बच्चन के घरेलू बैनर की फिल्म 'मृत्युदाता' और 'तेरे मेरे सपने' में नजर आये। इन बायोग्राफीकल बातों के अलावा अब कुछ ऐसी बातें, जो कम लोग ही जानते है। एक बार उनसे पूछा गया कि आप अगले जन्म में क्या बनना पसंद करेंगे? तो वे बोले, केवल प्राण। प्राण अकेले ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने कपूर खानदान की हर पीढ़ी के साथ काम किया, चाहे वो पृथ्वीराज कपूर हों, राजकपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, रणधीर कपूर, राजीव कपूर, रन्धीर कपूर, करिशमा कपूर, करीना कपूर हो। प्राण ने अपने 60 साल के फिल्मी कैरियर में केवल एक फिल्म 1992 में 'लक्ष्मण-रेखा' का निर्माण किया। अशोक कुमार के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। दोनों ने 25 फिल्मों में एक साथ काम किया।18अप्रैल 1945 को प्राण ने शुक्ला आहलुवालिया से विवाह रचाया। उनके तीन बच्चे हैं। दो लड़के अरविंद और सुनील और एक लड़की पिंकी।1997 में उन्हें फिल्मफेयर के"लाइफ अचीवमेंट अवार्ड" से नवाज़ा गया। 12 जुलाई 2013 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)
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