मनीषा पांडेय
पितृसत्ता तो है मर्दों का दर्जा ऊंचा भी है। हम दोयम भी हैं। मुश्किलें भी हैं। चुनौतियां भी हैं। कुल मिलाकर सच यही है कि मर्दों के आधिपत्य वाली इस दुनिया में जिंदगी हमारी आसान नहीं।
अब जबकि कुछ भी आसान नहीं है तो उसमें दो बातें हो सकती हैं। या तो हम बैठकर यह बात करें कि कुछ भी आसान नहीं है या ये करें कि इन तमाम मुश्किलों के बीच भी इसे थोड़ा आसान कैसे बनाएं। कैसे अपने लिए रास्ता निकालें। कैसे थोड़ा हाथ-पैर फैलाने, थोड़ा सिर उठाने की जगह बनाएं। क्योंकि कितनी भी नाराजगी क्यों न हो, जगह नाराज होने से नहीं, जगह बनाने से बनेगी।
कुछ साल पहले इलाहाबाद में एक लड़की से उसकी पढ़ाई के बारे में बात हो रही थी। उसको शिकायत थी कि उसे घर के काम करने पड़ते हैं, इसलिए वो पढ़ नहीं पाती. घर में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं था। मां-पिता का लक्ष्य 18 पूरी होने पर उसकी शादी कर देना था।
इस शादी से बचने का एक ही तरीका था कि वो पढ़ाई में असाधारण हो।
लेकिन वो कैसे हो क्योंकि उसे तो घर के काम करने पड़ते हैं। पढ़ाई हो नहीं पाती।
एक तरीका ये था कि मां से लड़ाई करें. घर में हाथ बंटाने से साफ इनकार कर दें. "नहीं करूंगी, सिर्फ पढूंगी।”
लेकिन ये भी मुमकिन नहीं था क्योंकि मां खुद काम पर जाती थी। एक दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थी. पति से कमतर भी थी, उसकी मार भी खाती थी. छोटे भाई भी थे. गलती किसी की नहीं थी, लेकिन सब एक-दूसरे के साथ गलत कर रहे थे।
फिर हमने सोचा कि इस मुश्किल में अपने लिए रास्ता कैसे निकालें।
मैं एक कागज-कलम लेकर बैठी और हिसाब लगाना शुरू किया।
- अभी तुम कितने घंटे घर का काम करती हो।
- पूरे दिन।
- क्या-क्या काम?
- खाना-बर्तन धोना।
- दोनों वक्त?
- नहीं, एक टाइम. एक टाइम मां करती है।
- कितना वक्त लगता है एक टाइम का खाना बनाने में?
- आधा दिन उसमें ही चला जाता है।
- जाने को तो पूरा दिन भी जा सकता है. लेकिन सोचकर बताओ, हिसाब लगाकर. अगर तुम रसोई में घुसो और तुम्हें पांच लोगों का एक वक्त का खाना बनाना है तो कितना टाइम लगेगा?
लड़की ने हिसाब लगाया और बोली, "एक साथ करूंगी तो एक घंटा।”
- गुड. और बर्तन धोने में?
लड़की ने फिर हिसाब लगाया और बोली "आधा घंटा।”
- यानी डेढ़ घंटे. इसमें आधा घंटा और जोड़ लो। यानी कि कुल दो घंटे अगर तुम घर के काम को दो तो 24 घंटे में से गए दो और बचे 22.
(कागज पर लगाए गए इस हिसाब के बाद उसे खुद भी पहली बार लगा कि ये तो सारा काम हो भी गया और 22 घंटे अब भी बचे हुए हैं।)
फिर हमने तय किया कि आज घर जाकर वो मां से बात करेगी और कहेगी कि एक वक्त का पूरा खाना बनाने और बर्तन धोने की जिम्मेदारी वो ले रही है. और इस काम को वो रोज जिम्मेदारी से करेगी. इतने वक्त के लिए मां निश्चिंत होकर अपना काम कर सकती हैं। लेकिन इतना करने के बाद बाकी का समय उसे अपने लिए चाहिए। एक बार अपने हिस्से का काम खत्म कर लेने के बाद उसे बार-बार छोटे-छोटे कामों के लिए आवाज न दी जाए क्योंकि उसे पढ़ना है। वो मां को ये भी समझाएगी कि ये पढ़ाई उसके लिए क्यों जरूरी है।
हमने तय किया कि ये संवाद वो अपने दोनों भाइयों से भी करेगी कि वो अपने काम खुद करें और बार-बार बहन को हर चीज के लिए न पुकारें।
ये रास्ता कारगर रहा।
हमने झगड़ा भी नहीं किया. हम अपने काम, अपनी जिम्मेदारी से मुकरे भी नहीं और हमने अपने लिए रास्ता भी निकाल लिया।
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मुझे पता है ये आदर्श स्थिति तो नहीं है। लेकिन आदर्श स्थिति कभी होगी भी नहीं। कम-से-कम इस जीवन में तो नहीं।
तो क्या बैठकर रोएं कि पितृसत्ता कितनी जालिम है या उसी पितृसत्ता में से अपने लिए रास्ता निकालें।
(लेखिका चर्चित
पत्रकार हैं। भास्कर और इंडिया टुडे आदि पत्र-पत्रिकाओं से संबंद्ध रही हैं।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। सहमति के विवेक के साथ असहमति के साहस का भी हम सम्मान करते हैं।