वीना श्रीवास्तव, रांची:
सूरज रोज उगता है और अगले दिन फिर से उगने के लिए उसे डूबना ही पड़ता है। हां कभी- कभी उसका डूबना बहुत खलता है, लगता है काश ये दिन न गुजरे, थम जाए। ऐसा ही लगा जब आदरणीय (स्व.) हैरत फर्रुखाबादी के बारे में जाना। लगा कि काश सूरज ना डूबता लेकिन इस सूरज को फिर से उजाला करना ही है, ये शायद उसका अपनी गोधूलि की बेला से अथाह प्रेम था, जिसके जीवन से चले जाने के बाद वो उस नन्हे से वक्त के खालीपन को सह सका। सूरज थकता नहीं है फिर भी डूबता है।
8- 9 वर्षों पहले हैरत साहब से एक मुशायरे में मुलाकात हुई
करीब 8- 9 वर्षों पहले हैरत साहब से एक मुशायरे में मुलाकात हुई, जो नसीर अफसर साहब ने अंजुमन प्लाजा में कराया था। बस उसके बाद तो अनेक गोष्ठियों में मुलाकात हुई। बहुत से मंच उनके साथ साझा किये। एक शायर के रूप में सभी उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मगर उसके साथ वह एक बेहतरीन इंसान थे। पहला वाकया यूं हुआ कि हमारे घर पर एक गोष्ठी थी। दो- तीन बार उनका फोन किया, मगर लगा नहीं और फिर गोष्ठी से एक दिन पहले उनसे बात हुई। मैंने बताया कि चाचा जी, कल घर पर एक गोष्ठी है, आपको आना है। उन्होंने कहा, बेटे आप बुलाओ और मैं ना आऊं ये तो हो नहीं सकता। सबसे बड़ी बात सबसे मिलना हो हो जाता है और कुछ वक्त सुनना - सुनाना हो जाता है। लेकिन बेटा कल के लिए माफ कर दो। मैंने पूछा क्यों अगर आने-जाने की दिक्कत है, तो इंतजाम हो जाएगा। बोले नहीं, ये बात नहीं। बात यह है कि मेरे बच्चे घर आकर वापस जाएंगे। मैं बच्चों को पढ़ाता हूं। वो सब दूर-दूर से आते हैं ।अगर दो दिन पहले पता होता तो मैं उनको मना कर देता। उनकी क्लास दूसरे दिन ले लेता। लेकिन अब मेरे बच्चे मेरे पास दूर से पढ़ने आएंगे और उनको वापस जाना पड़ेगा।मैं बच्चों को परेशान नहीं करना चाहता। उस उम्र में इतना ख्याल बच्चों का, उनके भविष्य का, उनकी शिक्षा का, ये कोई मामूली बात नहीं है। ये जज्बा था एक शिक्षक का। वह बहुत हुलस कर बताते थे कि फलां-फलां मेरा पढ़ाया हुआ है और अब भी टीचर्स डे पर सबके फोन आते हैं। वो सारे फोन मेरा इनाम हैं। मेरी कमाई है। मुझे लगा कि वाकई ऐसे शिक्षकों की ही जरूरत है समाज में। एक बार एक सम्मान समारोह और गोष्ठी में गई थी वहां भी वह इसलिए नहीं गए क्योंकि उनके बच्चे वापस चले जाते जो दूर से उनके पास पढ़ने आते थे।

मन से एक सच्चे शिक्षक रहे अपने अंतिम समय तक
उनके साथ काफी मिलना हुआ। एक बार की बात उन्होंने बतायी कि वो जब रेसीडेंशियल स्कूल में थे। उन्होंने बताया कि वहाँ एक बच्चा पढ़ने आया, जो पढ़ाई में काफी कमजोर था। उसका मजाक भी उड़ा। फिर मैंने अपने प्रिसिपल से बात की और उसे एक्सट्रा क्लासेस दीं। मैं उसे रोज अलग से पढ़ाता था और फिर उस बच्चे ने क्लास में पोजीशन होल्ड की। उनहोंने यह भी बताया कि जब मैं पढ़ता था तो हमें भी ऐसे ही शिक्षक मिले। उनके एक टीचर थे जो उनके घर पहुंच गए थे। हुआ यूं था कि वह मैथ्स के अध्यापक थे। उन्हें गणित पढ़ाते थे। उस दिन जो भी पढ़ाया वो समझ नहीं आया और ना उसका फार्मूला लगाना। जब फार्मूला समझ में नहीं आया तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा। लेकिन उन अध्यापक को आभास हो गया और वो उनका घर ढूंढते हुए आ पहुंचे और सीधे ही पूछा क्या तुम्हें आज जो पढ़ाया, वो समझ में आया। मुझे लगता है नहीं आया... मैंने कहा हां, समझ नहीं आया और फिर उन्होंने काफी देर तक समझाया। तब फख्र से कहा कि ऐसे टीचर होते थे हमारे समय पर तो मैं भी अपने बच्चों को कभी परेशान नहीं कर सकता। वो देश का भविष्य होते हैं। वह मन से एक सच्चे शिक्षक रहे अपने अंतिम समय तक। जब दो साल पहले वो काफी बीमार हुए और उसके बाद उनसे मुलाकात हुई तो वो परेशान थे बोले- बेटा डॉ. ने एकदम मना कर दिया पढ़ाने से। ऐसे कैसा हो सकता है कि मैं ना पढ़ाऊं... मैने डॉ. से कह दिया कि अगर पढ़ाने से मना करोगे तो जरूर मर जाउंगा और कुछ समय बाद ही डॉ. ने सुबह दो घंटे पढ़ाने की अनुमति दे दी थी और उन्होंने बड़ी चहकती आवाज में फोन किया कि बेटा अब मैं पढ़ाने लगा हूं, डॉक्टर ने परमीशन दे दी।
किसी उस्ताद से इस्लाह लेने से बेहतर है खूब पढ़ो और लिखो
जब उनसे पूछा कि आपने ग़ज़ल लिखना कैसे सीखा तो उन्होंने बताया कि जब हम लिख रहे थे तो हम अपने उस्ताद के पास गए और उन्हें इसलाह के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि कभी भी ऐसे इसलाह मत लेना। पहली बात तो इसमें तुम्हारे अशआर तुम्हारे नहीं रहेंगे। तुम्हारे शे'रों की रूह मर जाएगी। तब मैंने कहा कि क्या करूं, कैसे सीखूं...? उन्होंने जवाब दिया कि जितना पढ़ सकते हो, पढ़ो, समझो, उनकी बारीकियों को देखो और फिर अपना कलाम देखो। अगर तब कुछ समझना हो तो पूछना। लेकिन पहले खूब पढ़ो और उन्होंने बताया कि वो कुछ ही समय में उनके यहां की लाइब्रेरी की सभी उर्दू अदब की सारी पुस्तकें पढ़ चुके थे। वह कहते थे कि लोग तो आमद का शेर कहते हैं मेरी तो पूरी ग़ज़ल ही आमद की होती है।
टार्च जलाई, कलम उठाई, डायरी खोली और लिखने लगा
एक और बहुत प्यारा-सा वाकया बताया- वो ‘फुटप्रिंट’ का अनुवाद करना चाहते थे और इसके लिए बहुत समय लगा। ना जाने कितने पन्ने रंगे और फेंक दिये। वो लिखते थे लेकिन उन्हें लगता था कि कितना बेकार लिखा है... कुछ बन नहीं पा रहा था। उन्होंने बताया, एक रात सो रहा था, पता नहीं कैसे कुछ दिमाग में आया। मैं टार्च, पेन और डायरी बगल में रखकर सोता हूं। बस टार्च जलाई, कलम उठाई, डायरी खोली और लिखने लगा। बेटा विश्वास करो कि एक-एक शब्द ऐसा लगा कोई लिखा रहा है। एक बार में पूरा तर्जुमा हो गया। मैं आश्चर्यचकित था। शायद मां सरस्वती खुद ही शब्द बनकर आ गई थीं और फिर उन्होंने वह रचना सुनाई। ये भी जुनून था कि जिस रचना को पसंद किया, तर्जुमा करना चाहा तो कैसे आमद हुई और वह कलाम पूरा हो गया।
उर्दू अदब का बेहतरीन सितारा थे वो जो हमेशा चमकता रहेगा
ना जाने ऐसे कितने किस्से हैं शायरी के, जो आज भी यादो में ताजा हैं। वह हम सभी के लिए प्रेरणा थे। उस उम्र में भी 6 -7 घंटे पढ़ाना और हर नशिस्त में जाना। हमेशा खड़े होकर पढ़ना। लेकिन पहली बार उनकी मायूस आवाज सुनी जब चाचीजी नहीं रहीं... उन्होंने बहुत मायूसी के साथ फोन किया। मैं चौंक भी गई कि इतनी सुबह फोन वो नहीं करते। अक्सर दोपहर में ही करते थे... उन्होंने कहा – बेटा आपकी मां नहीं रहीं... आज सुबह..... हमें छोड़ गईं... मैंने कहा कि वो तो घर आने वाली थीं। खैर... कुछ सेकेंड का सन्नाटा। फिर हल्की सुबकने की आवाज़, रुंधे गले का सिसकता- सा रूदन...मैं काफी समय तक परेशान रही। वो खबर तो मनहूस थी ही मगर मेरे लिए उनकी वो आवाज उससे भी ज्यादा तकलीफ देह थी। जब चाचाजी बीमार थीं तो वह बहुत परेशान थे और कहते थे कि बच्चे हॉस्पीटल जाने नहीं देते। तब मैं कहती थी कि ठीक ही कहते हैं, आपको नहीं जाना चाहिए। फिर वो कहते कि इतना हंसी-खुशी के साथ जीवन गुजार दिया, तुम्हारी चाची के बिना तो जीवन सोच भी नहीं सकता। वाकई, उनके बिना जीवन नहीं जी सके। वह एक सच्चे शिक्षक, सच्चे शायर तो थे ही। उसके साथ ही अपने रिश्तों और प्रेम में भी हमेशा सच्चे रहे। 21 मई को चाची जी नहीं रहीं और दो महीने भी पूरे नहीं हो पाए कि वो भी अलविदा कह गए। उनका जाना साहित्य जगत की लिए अपूर्णीय क्षति है। उर्दू अदब का बेहतरीन सितारा थे वो जो हमेशा चमकता रहेगा। उनको शत्- शत् नमन।
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नसीर अफसर के भी रहे हैरत करीब
उर्दू के शायर नसीर अफसर के मुताबिक मशहूर शायर हैरत फर्रुखाबादी का असली नाम ज्योति प्रसाद मिश्र था। 18 फरवरी 1930 को उनका जन्म यूपी केबहराइच में हुआ था। अंजुमन बक़ा ए अदब रांची (रजि.) के अध्यक्ष रहे हैरत फर्रुखाबादी का 11 जुलाई की रात 11.45 बजे रांची स्थित अपने आवास पर उनका 91 वर्ष कीउम्र में निधन हो गया। उर्दू में उनके दो काव्य संग्रह " नवाये साज़े दिल " , " हिस्से इलतेमास " और हिंदी में " जो कुरेदे घाव मन के " बहुत प्रसिद्ध हुये। आप नेवरी स्थित आवासीय विकास विद्यालय में अंग्रेज़ी के 1960 से 1990 तक शिक्षक रहे। फिर 1990 से 2000 तक ग्रीन लैंड पब्लिक स्कूल प्रेम नगर , हेसाग के प्राचार्य रहे । आप ने रघुपति सहाय " फ़िराक़ गोरखपुरी और मजनूं गोरखपुरी के कदमों पर बैठ कर उर्दू के प्रसिद्ध शायर बने। आप अपने पीछे दो बेटे रजनीश और मनीष , एक बेटी अंशु और भरा पूरा परिवार छोड़ गये।)