चंद्रभूषण, दिल्ली:
शायद लोग भूल रहे हैं कि देश आंदोलन की बुनियाद पर खड़ी है। भारत में सुभाष चंद्र बोस, गांधी, पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय से लेकर जे.पी. तक आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है। आजादी की लड़ाई जिसे हम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नाम से भी जानते हैं, गांधीजी ने सत्य ,अहिंसा, त्याग, बलिदान, सेवा, सहयोग की विचारधारा, मूल्यों और अपने आदर्शों से स्थापित किया था। गांधीजी की इन्हीं विचारधाराओं का आज पूरा विश्व कायल है। देश में नवनिर्माण आंदोलन (गुजरात), जे.पी. आंदोलन से लेकर अन्ना और किसान आंदोलनों को भी गांधीजी के आंदोलनों से प्रेरणा और ऊर्जा मिली है, इसे कोई नकार नहीं सकता। धरना- प्रदर्शन के जरिए अहिंसक आंदोलन किसी भी लोकतंत्र की प्राणवायु है। साथ ही जनतांत्रिक एकता, अखंडता और एकजुटता को मजबूती प्रदान करने का भी काम करता है यह आंदोलन। जन-आंदोलन की खूबसूरती यही है कि अपने अधिकारों, कर्तव्य बोध, अन्याय आदि के प्रति सोई या अंधभक्ति में सुला दी गई आम आदमी की इंसानियत को जागृत करने का टॉनिक देता है।

संसद में जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी व्यंग्यात्मक व कुटील शैली में आंदोलनों की हवा निकालने की गरज से "आंदोलनजीवी" जैसे शब्द गढ़ते हैं और उन्हें "परजीवी" से संबोधित करते हैं तो इसे फासीवादी विचारधारा को देश में थोपने की कोशिश ही कहेंगे। जुमलेबाजी के लिए प्रसिद्ध मोदी जी व उनके सहयोगी मित्र इसके पूर्व भी केजरीवाल के आंदोलनकारियों को "अर्बन नक्सली", "ए.के.-47", किसान आंदोलनकारियों को "खालिस्तानी" ,"आतंकवादी", "देशद्रोही" जैसी उपमा दे चुके हैं। वह यह भूल गए कि सत्ता में आने के पहले "राम जन्मभूमि आंदोलन", पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन कौन किया करते थे? ट्विटर पर कौन कहते थे कि देश को जन आंदोलन की जरूरत है? आज देश के युवाओं या नई पीढ़ी के दिलो-दिमाग में "राष्ट्रवाद" की घटिया परिभाषा सोशल मीडिया या भाजपा परिवार के ट्रोल आर्मी द्वारा जबरन ठूंसा जा रहा है। गोया कि आंदोलनकारी या सत्ता के खिलाफ लिखने-बोलने वाले देशद्रोही-राष्ट्रद्रोही या आतंकवादी हैं। जबकि इन पीढ़ियों को यह बताने की जरूरत है कि देश की महान राष्ट्रवादी परंपरा रही है। दरअसल जर्मनी के नाजी/ हिटलर के राष्ट्रवादी सोच की नकल भारत में लाने की कोशिश चल रही है।

कभी आपने सोचा कि आंदोलन क्यों होते हैं? क्यों लोग घर-बार छोड़कर सड़कों पर निकलते हैं? आप जानते हैं एक आंदोलन करने के लिए बड़ी इच्छा शक्ति और लोगों को एकजुट करने की भावना होती है। दरअसल निरंकुश सत्ता की ओर बढ़ रहे शासकों को आंदोलनों से डर लगता है। उन्हें स्वतंत्र बुद्धिजीवियों/पत्रकारों की लेखनी या विचारों से तिलमिलाहट पैदा होती है। क्यों नहीं कोई भी नीति या कानून बनाने से पहले आम जनता को विश्वास या भरोसे में लिया जाता है?
शायद हमारे जुमलेबाज प्रधानमंत्री "आंदोलनजीवी" "आंदोलन रोगी" और "आंदोलन भोगी" में फर्क करना भूल गए हैं। आंदोलनजीवी आंदोलन को जीते हैं। संघर्ष करते हैं। यह नहीं सोचते यह आंदोलन सफल होगा या विफल। अपनी सीमित ऊर्जा व ताकत से मजबूत सत्ता प्रतिष्ठानों से टकराते हैं। वह सपनों को जीते हैं। उन्हें सपने सोने नहीं देती। हमेशा बदलाव की सोचते हैं। परिवर्तन की सोचते हैं। सच से भागते नहीं। "आंदोलनरोगी" को तो आंदोलन नाम से ही डर लगने लगता है क्योंकि उनकी नीतियां या कानून आम लोगों के खिलाफ होती हैं। अब रही बात "आंदोलनभोगी" की तो इसे भाजपा परिवार से पूछना चाहिए कि "राम जन्मभूमि आंदोलन" के फलस्वरूप सत्ता सुख या पता चाटने का आनंद कौन उठा रहा है? किसने राम के नाम को भुनाया या भगवान राम की छवि को बदनाम करने का काम किया है?
बिहार में नीतीश सरकार भी मोदी सरकार के नक्शे कदम पर चल रही है, तभी तो सोशल मीडिया पर लिखने वालों के खिलाफ एफ.आई.आर. या धरना-प्रदर्शन में शामिल युवाओं को सरकारी नौकरी या सरकारी ठेके नहीं देने की बात कर रही है। जेपी आंदोलन की उपज नीतीश कुमार युवाओं को सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ आवाज उठाने पर परिणाम भुगतने का डर दिखा रही है। दोनों सरकारों की प्रवृतियां स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक ही नहीं, विनाशकारी हैं।

(लेखक का अररिया (बिहार)में जन्म हुआ। स्कूली शिक्षा बिहार, झारखंड और दिल्ली से हुई। कॉलेज की पढ़ाई उत्तर प्रदेश और हरियाणा से। देश के कई अखबारों में काम किया। फिल्म-टीवी के क्षेत्र में भी लेखन। प्रतिनिधि हिंदी कहानियां, कारगिल के शहीद, पत्रकारिता और स्तंभ लेखन, पूर्वोत्तर भारत और अलगाववाद,जामुन से हवेली, एक बूंद पानी, लोहित किनारे, झारखंड पर्यटन, ऐसे रहें हमेशा खुश, यू कैन डू इट, दिल्ली सुशासन मॉडल, Terrorism and Separation in North East India, Assam : It's Heritage and culture समेत करीब 36 पुस्तकें प्रकाशित।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। असहमति के विवेक का भी हम सम्मान करते हैं।