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कविता के अभियंता ज्ञानेंद्रपति की क्‍यों हो रही है इतनी चर्चा

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संजय कृष्ण, रांची:
हिंदी कविता के एक बेहद अलहदा कवि ज्ञानेंद्रपति को नागार्जुन सम्मान की घोषणा हुई है। अलहदा इसलिए कि उनके यहां शब्दों के चमत्कार नहीं मिलते। अक्षरों की माला में शब्दों की निर्मितियां एक अलग उन्वान और अर्थछवियां ग्रहण करती हैं। शब्दों का युग्म उनके यहां बहुतायत है, जो बहुत कठिन साधना और परिश्रम से उन्होंने हासिल किया है। झारखंड के पठार से निकल गंगातटवासी होने की यात्रा में नि:संशय होने की कोशिश में  'संशयात्मा' रचते हैं। इस यात्रा के अनुभव ने बताया कि 'शब्द लिखने के लिए ही कागज बना है।'  कवि के कहते सुनते जब आप 'पढ़ते-गढ़ते' हैं तो फिर एक अलग स्वाद का परिचय मिलता है। पठार से अविचल और गंगा की तरह लहराते शब्दों और अर्थों की छटा उन्हें अपने समय के कवियों से अलगाती है। बेशक, वे अपने पूर्ववर्ती कवियों से भी अलग हैं। ज्ञानेंद्रपति ऐसे कवि नहीं हैं उन्हें खेसारी दाल की तरह निंदित उखाड़ कर फेंक सके। वे पूर्णकालिक कवि हैं और एक लेखक की क्या अपेक्षा हो सकती है-न नगदी न बैंक बैलेंस। शिशिर की जड़ाती रात में बस गंगा के तटों पर घूमने का जो सुख है, गोदौलिया से लंका पैदल जाने के जो अनुभव हैं, वह कोई ज्ञानेंद्रपति से पूछे। पूछे नदियों की रुलाई के बारे में-

      नदी!
     तू इतनी दुबली क्यों है
     और मैली-कुचैली
     मरी हुई इच्छाओं की तरह मछलियां क्यों उतरायी हैं
     तुम्हारे दुॢदनों के दुर्जल में....

एक और छोटी कविता से गुजरिए-
यह कविता सभ्यता समीक्षा है। अपने भीतर देखने और सुनने की भी। 

नदी के किनारे नगर बसते हैं
नगर के बसने के बाद
नगर के किनारे से
नदी बहती है।

नदी को नाला बना दिए और फिर उसे नदी बनाने की फितरत में लगे हैं। संवेदहीनता के इस कुंठित दौर में प्रकृति की सायास हत्या करते हुए हम उसे बचाने का ढोंग भी कर रहे हैं। कवि की ये चंद पंक्तियां पूरी सभ्यता के सामने का प्रश्न खड़ा करती है। सभ्यता के इस यात्रा में हम कितने हिंसक, मारक, रक्तपिासु, चेतना शून्य, आत्महंता होते गए हैं। उसके लिए तरह-तरह के मनभावन शब्द गढ़ते रहते हैं-यह आत्महंता का सुख भी कितना अजीब है। नदी, नाले, पेड़-पौधे, पठार-पहाड़ सब कुछ विकास के नाम पर नष्ट करने की आतुरता...। यह पृथ्वी पर बसा मनुष्य ही कर सकता है।  कवि राजेंद्र आहुति ठीक ही कहते हैं, वे कवि नहीं, कविता के अभियंता हैं। -एफबी से साभार

(मूलतः जमानिया, गाज़ीपुर के संजय कृष्ण की पहचान साहित्य-संस्कृति से जुड़े पत्रकारों में होती है। कई किताबें प्रकाशित। जिसमें संजीब चट्टोपाध्याय के ऐतिहासिक यात्रा-वृतांत पलामू का संपादन, झारखंड के पर्व-मेले और पर्यटक स्थल, यात्राओं में झारखंड, झारखंड के मेले, गोपालदास गहमरी के संस्मरण (संपादन), साहित्य अकादमी के लिए गहमरी का मोनोग्राफ, गहमरी की प्रसिद्ध जासूसी कहानियों का चयन-संपादन, भवानी दयाल की पुस्तक सत्याग्रही महात्मा गांधी, महावीर के सत्याग्रह विशेषांक का संपादन आदि शामिल हैं। सम्प्रति रांची के दैनिक जागरण से सम्बद्ध)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।