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फिल्‍म अंजुमन के बहाने: क्‍या कहा शबाना आजमी और वहीदा रहमान ने

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मेहजबीं, दिल्‍ली:
मुज़फ़्फ़र अली के निर्देशन में बनी फिल्‍म अंजुमन (1986) का म्यूजिक मुहम्मद जहूर ख़य्याम ने दिया है। जिस गीत पर फिल्म ख़त्म होती है, उसे फैज़ अहमद फैज़ ने लिखा है। और जनांदोलन पर आधारित उस ख़ूबसूरत गीत को जगजीत सिंह और जगजीत कौर ने बहुत ख़ूबसूरती से गाया है। हालांकि अंजुमन फिल्म गर्म हवा और उमराव जान की तरह मशहूर नहीं हो सकी। हिन्दुस्तान की तमाम यूनीवर्सिटीज़ में साहित्य और जर्नलिज्म पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को कलात्मक फिल्मों के बारे में कभी न कभी सिलेबस या सेमिनार व्याख्यान में बताया जाता है। कुछ फिल्में हमेशा प्रासंगिक रहेंगी। जब अच्छी सामाजिक राजनीतिक आर्थिक दलित विमर्श स्त्री विमर्श जनांदोलन से जुड़ी क्रांतिकारी फिल्मों की चर्चा होती है। कुछ फिल्में हमेशा याद की जाती हैं, जैसे गर्म हवा,उमराव जान, सद्गति, मंडी,अर्थ,मिर्च मसाला,आक्रोश, बाज़ार, साथ-साथ,पार्टी, इजाज़त इत्यादि। मैंने भी अपने स्टूडेंट्स लाइफ में बहुत सी फिल्मों की चर्चा सुनी।और मुतास्सिर होकर देखी। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता के दौरान हिन्दी सिनेमा के इतिहास का एक विषय हमारे किसी पेपर में था। उसकी कक्षा हुआ करती थी। मुझे बहुत पसंद थी वो कक्षाएं। बेहतरीन फिल्मों का ज़िक्र उन कक्षाओं में हुआ करता था। मैं रात को आकर वो फिल्में ज़रूर देखती थी। फिल्म देखकर मैं बहुत सोचती थी।



उर्दू ठेठ हिन्दुस्तान की ज़बान: वहीदा रहमान
कल मैं यू ट्यूब पर कुछ सर्च कर रही थी। सामने रेख़्ता की एक वीडियो आ गई। उस विडियो में मेहमान थी वहीदा रहमान, शबाना आज़मी, मुज़फ़्फ़र अली। प्रोग्राम का विषय उर्दू भाषा थी। बॉलीवुड में उर्दू भाषा और तहजीब का स्थान। ये बातचीत बहुत उम्दा थी। इसपर यहां नहीं लिखूंगी। मगर दो बातों का ज़िक्र ज़रूर करूंगी। पहली जिसपर वहीदा रहमान ने ज़ोर दिया। उर्दू मुसलमान की ज़बान नहीं है। यह हिन्दुस्तान की ज़बान है। यह हिन्दी इंग्लिश की तरह स्कूलों में पढ़ानी चाहिए। और ईमानदारी से पढ़ानी चाहिए।विकल्प चुनने का अधिकार स्टूडेंट्स के हाथ में होना चाहिए कि वो हिन्दी इंग्लिश मातृभाषा के बाद अपनी इच्छा से अन्य भाषा का चयन करे। और जिसे उर्दू पढ़नी है वो पढ़े। आज दिल्ली के तमाम सरकारी  स्कूलों में उर्दू है... मगर भाषाओं को चुनने का जो विकल्प का ढाचा है। वो ऐसे है कि जो उर्दू भाषा चुनेगा उसे हिन्दी मीडियम मिलेगा,जो संस्कृत भाषा चुनेगा वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ेगा। इंग्लिश रोजगार की भाषा है अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है वो सबसे ज़रूरी है पढ़ना! इसलिए स्टूडेंट्स उर्दू नहीं चुनते। इस सियासत पर आप सब सोचें। ये बात मैं यहां ख़त्म करती हूं। क्योंकि यहाँ इसपर लिखना उद्देश्य नहीं है।

बॉलीवुड में दिखाया जाता है कृत्रिम समाज: शबाना आज़मी
दूसरी बात मुझे शबाना आज़मी की अच्छी लगी। बॉलीवुड में जो अक्सर मुस्लिम समाज दिखाया जाता रहा है। वो कृत्रिम समाज है।बॉलीवुड का बनाया हुआ। हक़ीक़त में वैसा नहीं है। कुछ फिल्मों को छोड़कर जिनमें मुसलमानों की हक़ीक़त दिखाई है उनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति। बाक़ी की फिल्मों में रोमांस शेरो शायरी उच्च घरानों की प्रेम कहानी दिखाई गई है। शबाना आज़मी ने दो फिल्मों का जिक्र किया एक गर्म हवा। दूसरी उनकी ख़ुद की फिल्म अंजुमन का। गर्म हवा ज़मीनी हक़ीक़त पर बनी फिल्म है। जिसमें आज़ादी के बाद भारत के ग़रीब मज़दूर मध्य वर्ग के सामाजिक आर्थिक संघर्ष ग़ैरबराबरी को दिखाया है। फिल्म का अंत जनांदोलन पर होता है। गर्म हवा हमेशा चर्चा में रहती है। मगर अंजुमन फिल्म इन चर्चाओं से गायब है। क्यों ? मैंने ख़ुद कल शबाना आज़मी के मुँह से ही इस फिल्म के बारे में सुना। इससे पहले कभी नहीं, किसी व्याख्यान किसी कक्षा किसी अख़बार में नहीं। अंजुमन यक़ीनन शबाना आज़मी की मास्टर पीस है। शबाना आज़मी की जब बात होती है तो मंडी, अर्थ, निशांत, अंकुर पर सूई आकर अटक जाती है। अंजुमन पर कोई क्यों नहीं बात करता ? जबकि अंजुमन भी आज़ादी के बाद मज़दूर तबके की सामाजिक आर्थिक स्थिति को,स्त्री अस्मिता, स्त्री अस्तित्व, स्त्री के निर्णय लेने के अधिकार, लाइफ पार्टनर चुनने के अधिकार को  बहुत क्रांतिकारी तरीक़े से पेश करती है।

अंजुमन से अभी तक बाहर नहीं निकल सकी हूं। शबाना आज़मी की फिल्म मंडी में वेश्यावृत्ति में फंसी महिलाओं की बहुत मार्मिक और विडंबनिय स्थिति दिखाई है। फिल्म में शबाना आज़मी ने बहुत उम्दा अभिनय किया है। मगर फिल्म …



(लेखिका का ननिहाल दरभंगा बिहार है, तो ददिहाल यूपी का सहारनपुर। रहती दिल्ली में हैं। पढ़ाई-लिखाई भी दिल्‍ली से ही। ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन दिल्ली विश्वविद्यालय से। पत्रकारिता जामिया मिल्लिया इस्लामिया से। बीएड चौधरी रनवीर सिंह यूनिवर्सिटी जिंद हरियाणा से। पत्र-पत्रिकाओं और सोशल साइटों पर कविता, संस्मरण, लेख, कहानी,फिल्म समीक्षा का प्रकाशन। संप्रति स्वतंत्र लेखन)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।