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लोहिया ने महज 40 साल की उम्र में लिखा था यह लेख, हिंदू बनाम हिंदू

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द फॉलोअप टीम, रांची:
स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, प्रखर चिन्तक और समाजवादी राजनेता डॉ राममनोहर लोहिया (23 मार्च1910-12 अक्टूबर1967) की आज जयंती है। हालांकि 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी होने के बाद डॉ लोहिया ने कभी अपना जन्मदिन  नहीं मनाया। वहीं अपने प्रशंसकों-अनुयायियों से भी नहीं मनाने का अनुरोध किया था। जब उनकी उम्र जब महज 40 साल की थी, तो सन 1950 में उन्होंने लेख लिखा था, हिंदू बनाम हिंदू। आज भी उतना ही सामयिक लगता है। इसमें उदार और कट्टर हिंदुत्व का विश्लेषण है। रांची के वरिष्ठ  पत्रकार श्रीनिवास ने इसे हमें 10 हिस्से में विभक्त कर उपलब्ध कराया है। द फॉलोअप उनका आभारी है। जेपी मूवमेंट से जुड़े रहे श्रीनिवास ने बरसों मुख्यधारा में पत्रकारिता की। संप्रति रांची में रहकर स्वतंत्र लेखन।

हिंदू बनाम हिंदू
डॉ राममनोहर लोहिया

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भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई, हिंदू धर्म में उदारवाद और कट्टरता की लड़ाई पिछले पाँच हजार सालों से भी अधिक समय से चल रही है और उसका अंत अभी भी दिखाई नहीं पड़ता। इस बात की कोई कोशिश नहीं की गई, जो होनी चाहिए थी कि इस लड़ाई को नजर में रख कर हिंदुस्‍तान के इतिहास को देखा जाए। लेकिन देश में जो कुछ होता है, उसका बहुत बड़ा हिस्‍सा इसी के कारण होता है।
सभी धर्मों में किसी न किसी समय उदारवादियों और कट्टरपंथियों की लड़ाई हुई है। लेकिन हिंदू धर्म के अलावा वे बँट गए, अक्‍सर उनमें रक्‍तपात हुआ और थोड़े या बहुत दिनों की लड़ाई के बाद वे झगड़े पर काबू पाने में कामयाब हो गए। हिंदू धर्म में लगातार उदारवादियों और कट्टरपंथियों का झगड़ा चला आ रहा है जिसमें कभी एक की जीत होती है कभी दूसरे की और खुला रक्‍तपात तो कभी नहीं हुआ है, लेकिन झगड़ा आज तक हल नहीं हुआ और झगड़े के सवालों पर एक धुंध छा गया है।

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ईसाई, इस्‍लाम और बौद्ध, सभी धर्मों में झगड़े हुए। कैथोलिक मत में एक समय इतने कट्टरपंथी तत्‍व इकट्ठा हो गए कि प्रोटेस्‍टेंट मत ने, जो उस समय उदारवादी था, उसे चुनौती दी। लेकिन सभी लोग जानते हैं कि सुधार आंदोलन के बाद प्रोटेस्‍टेंट मत में खुद भी कट्टरता आ गई। कैथोलिक और प्रोटेस्‍टेंट मतों के सिद्धांतों में अब भी बहुत फर्क है लेकिन एक को कट्टरपंथी और दूसरे को उदारवादी कहना मुश्किल है। ईसाई धर्म में सिद्धांत और संगठन का भेद है तो इस्‍लाम धर्म में शिया-सुन्नी का बँटवारा इतिहास के घटनाक्रम से संबंधित है। इसी तरह बौद्ध धर्म हीनयान और महायान के दो मतों में बँट गया और उनमें कभी रक्‍तपात तो नहीं हुआ, लेकिन उसका मतभेद सिद्धांत के बारे में है, समाज की व्‍यवस्‍था से उसका कोई संबंध नहीं।
हिंदू धर्म में ऐसा कोई बँटवारा नहीं हुआ। अलबत्‍त