श्रीनिवास
हमेशा से जानता और मानता रहा हूँ कि अच्छा खिलाड़ी और अच्छा अभिनेता अच्छा इंसान भी हो, कतई जरूरी नहीं। ऐसी अपेक्षा पालना ही गलत है। फिर भी हम जिसे पसंद करते हैं- चाहे वह खिलाड़ी हो, गायक हो, लेखक हो या नेता, उससे बेहतर मनुष्य होने की उम्मीद करते ही हैं। और इसी कारण अक्सर धोखा भी खाते हैं। ऐसे ही नाउम्मीद और निराश करने वालों में अब सचिन तेंदुलकर भी शामिल हो गये हैं। कोई शक नहीं कि सचिन ने अनेक बार करोड़ों देशवासियों को खुश होने का मौका दिया। अपने देश और अपनी क्रिकेट टीम पर गर्व करने का भी। वह हम सब का दुलारा था। पता नहीं कितने घरों में कितने युवाओं ने उसकी कितनी तस्वीरें और उसके बेशुमार रिकार्ड के छपे आंकड़े सहेज कर रखे होंगे। कभी उसके प्रति दीवानगी का आलम ऐसा था, जब सचिन की आलोचना करने पर कम उम्र के अनेक बच्चे मरने मारने पर उतारू हो जाते थे। उसकी कमजोरियां दिखने पर भी हम उन्हें इग्नोर कर जाते थे। बचाव करते थे। लेकिन छोटे कद का जो सचिन दुनिया के घातक गेंदबाजों के सामने भी बेख़ौफ़ और बल्लेबाज के रूप में बहुत बड़ा दीखता था, आज उसे बेरहम दिख रही सरकार के पक्ष में खड़े देख बेहद निराशा हो रही है. वह चुप भी रह जाता, तब भी शिकायत रहती. लेकिन तुम्हारी तो रीढ़ ही नहीं रही सचिन।

हालांकि मेरी नजर में उसकी आभा तभी क्षीण हो गयी थी, जब उसने यूपीए सरकार द्वारा राज्यसभा में नामजद किये जाने को बिना हिचक स्वीकार कर लिया था. उसे ‘भारत रत्न’ दिये जाने के पीछे भी राजनीति थी। हालांकि सचिन को देश का बेशकीमती रत्न तो मैं भी मानता था। दबे स्वर में यही तर्क तब दिया भी था। हालांकि समझ रहा था कि यह कमजोर तर्क है, ‘भारत रत्न’ सम्मान कुछ अलग और विशिष्ठ होता है। उसके लिए तय मापदंड के अनुसार भी सचिन को वह सम्मान नहीं मिलना चाहिए था। इसलिए तत्कालीन सरकार ने उस पैमाने को ही बदल दिया। लेकिन तब उसकी चमक और लोकप्रियता के कारण विपक्ष में रही भाजपा भी कुछ नहीं बोल सकी; या शायद वह भांप चुकी थी कि वक्त आने पर सचिन उसके काम ही आएगा। और सचिन ने निराश भी नहीं किया।

इसी तरह राज्यसभा के लिए मनोनीत किये जाने पर उसकी सदस्यता ग्रहण करने के बजाय यदि सचिन ने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया होता तो उसका कद कुछ और बढ़ गया होता। यदि वह राज्यसभा की बहसों में हिस्सा लेकर कुछ योगदान करता, तो भी उसका संसद के उस उच्च सदन में जाने का औचित्य साबित होता। लेकिन उसने तो शायद ही कभी सदन की गतिविधि में हिस्सा लिया। शायद हमने गलत अपेक्षा पाल रखी थी। सच कहूं तो मेरी पीढ़ी/उम्र के क्रिकेटप्रेमियों के हीरो तो सुनील गावस्कर थे। आज भी अनेक समीक्षक उन्हें तुलना में बेहतर बल्लेबाज मानते हैं। मगर खेल की बात छोड़ भी दें, तो गावस्कर एक साहसी और जुझारू इंसान थे/ हैं। जब हमने जाना कि '92-93 के मुंबई दंगों के दौरान अपने घर के सामने एक परिवार को दंगाइयों से घिरे देख कर बाहर निकल गये और उस परिवार को बचा लिए, तब से मेरी नजरों में उनका कद और ऊंचा हो गया। ऐसा होता है हीरो। काश कि सचिन भी कुछ साहस दिखा पाते। करोड़ों देशवासियों के आदर्श और अपने भी चहेते सचिन को अक्षय कुमारों और अनुपम खेरों की पंगत में खड़े देखना अच्छा नहीं लगा।
(लेखक जेपी मूवमेंट से जुड़े रहे। बरसों मुख्यधारा में पत्रकारिता की। संप्रति रांची में रहकर स्वतंत्र लेखन)
नोट: यह लेखक के निजी
विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। असहमति के विवेक का भी हम सम्मान
करते हैं।