प्रियदर्शन, दिल्ली:
वेब सीरीज़ बहुत समय लेती है, इसलिए देखने से अमूमन बचता हूं। लेकिन 'महारानी' फिर भी देख ली। उमाशंकर सिंह का मामला था। उन्होंने इसकी पटकथा लिखने में मदद की है और इसके संवाद लिखे हैं। वैसे भी इसके 'क्रिएटर' सुभाष कपूर को एकाधिक वजहों से मैं पसंद करता रहा हूं।
बहरहाल, चार दिन में दस किस्तों वाली यह सीरीज़ इसलिए भी देख पाया कि यह देखने लायक है। नहीं तो एकाध किस्त देख कर छोड़ भी सकता था। ऐसा नहीं कि यह महान सिनेमा है, लेकिन यह आपको नब्बे के दशक के उस बिहार में ले जाती है जहां लालू यादव की पिछड़ा राजनीति के उभार के समानांतर चारा घोटाले का ग्रहण चलता रहा और अंततः उसने एक बड़ी राजनीतिक संभावना को किसी दूरस्थ भविष्य के लिए स्थगित कर दिया। इस बिहार में सामंती ऐंठ से लैस जातिगत सेनाएं भी हैं और पिछड़े-दलितों के हक़ में खड़े हुए ख़ुद को क्रांतिकारी मानने वाले समूह भी। राजनीति दोनों को साधने की कोशिश करती है और इस कोशिश में गोलियां भी चलती हैं और सवाल भी उठते हैं।
जातिगत दुराग्रहों से भरी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबनाओं की ओर पर्याप्त इशारा करती यह सीरीज़ बहुत चालाकी से बनाई गई है। आपको लालू यादव, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार- सबकी याद आएगी, लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि ये वही किरदार हैं। उनमें खासा हेर-फेर किया गया है। कह सकते हैं, बड़ा परिदृश्य वही है। यानी इसमें चारा घोटाला भी है, लक्ष्मणपुर बाथे भी है, चरवाहा विद्यालय भी है, इस्तीफ़े की मजबूरी के बाद अनपढ़ पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रसंग भी है। राजनीति की वह गिरावट तो है ही जिसमें बाबा से लेकर अपराधी तक अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं।
लेकिन यह सीरीज़ अंततः बिहार की हक़ीक़त नहीं, उसकी फंतासी साबित होती है- काश एक नेतृत्व होता जो बिहार को बदलता। सीरीज़ की आख़िरी किस्तों में कहीं एक संवाद आता है- 'बिहार इज़ नॉट अ स्टेट, इट इज़ अ स्टेट ऑफ़ माइंड।'
सीरीज़ में कुछ कमियां भी हैं। १९९८ के साल में समाचार चैनल इतने नहीं थे कि नेताओं को माइक से घेर लें। मोबाइल का भी चलन नहीं के बराबर था। (हालांकि इसमें भी नहीं के बराबर है) कुछ दृश्यों को और यथार्थपरक बनाया जा सकता और कुछ स्थितियों में और कल्पनाशीलता दिखाई जा सकती थी।
लेकिन इस 'सकता-सकती' वाले मीनमेखी अंदाज़ से अलग यह सीरीज़ आपको अपने साथ जोड़े रखती है, इसमें संदेह नहीं।
हां, सीरीज़ में एक मित्र और हैं। विभा रानी की भूमिका छोटी है लेकिन ज़रूरी नाटकीयता से भरी यह भूमिका उन्होंने ऐसे की है कि उन्हें अलक्षित नहीं किया जा सकता।
(प्रियदर्शन का जन्म और शिक्षा-दीक्षा रांची में हुई है। उपन्यास 'ज़िंदगी लाइव', कहानी संग्रह 'बारिश, धुआं और दोस्त' और 'उसके हिस्से का जादू', कविता संग्रह 'नष्ट कुछ भी नहीं होता' सहित नौ किताबें प्रकाशित। कविता संग्रह मराठी में और उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित। सलमान रुश्दी और अरुंधती रॉय की कृतियों सहित सात किताबों का अनुवाद और तीन किताबों का संपादन। विविध राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर तीन दशक से नियमित विविधतापूर्ण लेखन और हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। सम्प्रति दिल्ली में रहकर 15 सालों से NDTV में सेवारत।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।