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जयंती आज: प्रभाष जोशी ने जब बताया था हिन्दू होने का धर्म मार्फत कनक तिवारी

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कनक तिवारी
प्रभाष जोशी (15 जुलाई 1936- 5 नवंबर 2009) और मैं मित्र, बन्धु या हर परिभाषा से परे आत्मीय थे। ‘हमारी राजनैतिक, सामाजिक और गांधीवादी विचारधाराओं में टकराव नहीं है‘-ऐसा मैं उनसे कहता, तो कहते ‘टकराव नहीं, ठहराव कहो।‘ मुस्कराने तथा ठहाका लगाने के बीच बोलते बोलते हंसते और हंसते हंसते बोलते रहते। उग्र हिन्दुत्व का नुकीलापन मुझे गड़ता रहा है। मैंने दंभ में कहा था, मध्यप्रदेश के ज्ञात बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा मैंने लिखा है। प्रभाष जी ने कहा लगी शर्त। उनके आग्रह पर एक रविवार सुबह जनसत्ता कार्यालय पहुंचा। उन्होंने हिन्दुत्व संबंधी अपने लेखों का पुलिन्दा थमा दिया। मैं देखता और विस्मित तथा पराजित होता रहा। उस दिन उनकी मुस्कान मुझे कुटिल लगी थी, स्नेहिल-कुटिल। बचाव में मैंने कहा ‘प्रभाष जी, अब भी कहता हूं मुझसे ज्यादा और तीखा लेखन हिन्दुत्व को लेकर मध्यप्रदेश में किसी लेखक ने नहीं किया है। ‘उन्होंने कहा, ‘बंधु, इस पुलिन्दे में भी तो वैसे ही स्वतंत्र लेखों की भरमार है।‘ मैंने कहा ‘आप मध्यप्रदेश के लेखक कहां रहे। आप तो राष्ट्रीय लेखक हैं।‘ वे झेंपते हुए बोले। ‘इससे क्या मैं मध्यप्रदेशीय नहीं रहा?‘ बिहारी उच्चारण में हासिल महारत में बोले ‘का हो, लालू यादव राष्ट्रीय नेता हो जाने से बिहारी नहीं रहेगा?



हिंदुत्व के ऑक्टोपस में  प्रभाष जोशी 
‘हिन्दू होने का धर्म‘ उनके संकलित लेखों का कलेवर बनकर छपा। एक बहुप्रतीक्षित, बहुचर्चित, बहुआयामी किताब साहित्य के हाथ आई। एक नार्मदीय ब्राम्हण ने हिन्दुत्व के हिंसक, संकीर्ण और कालतिरस्कृत मुद्दों को प्रभविष्णुता, वाक्वैदग्ध्य और तार्किकता के साथ निपटाया है। उसके मुकाबले संस्कृति, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के शास्त्रीय अंगरेजी ग्रंथों को पसीना आ जाता है। प्रभाष जी में हिन्दू धर्म के प्रति विचार एक अंतर्भूत प्रक्रिया में उनके वृहत्तर व्यक्तित्व से फूटता था। वह समावेशी, सर्वप्रदेशीय और जातिरहित था। दक्षिण पंथ की विजय होने पर उन्हें कोफ्त होती थी। वे उसके पराजय पर्व के भविष्य वाचक थे। कांग्रेस जैसी मध्यमार्गी संस्था के बदमिजाज, भ्रष्ट और सत्ता लोलुप होने को लेकर प्रभाष जोशी ने उसे भी नहीं बख्शा। 



संकीर्ण राष्ट्रवाद से बहस करने का साहस
‘हिन्दू होने का धर्म‘ मेरी दृष्टि में हिन्दुइज्म का छोटा मोटा आधुनिक एनसाइक्लोपीडिया है। उसमें अंतर्निहित दार्शनिक बहस का स्तरीय विमर्श है। उसमें केवल तर्क नहीं। सच्ची समझ का आत्मविश्वास है। भाषा अहसासों को इस तरह परोसती है कि पाठक डूबता चला जाता है। हिंदुत्व की कठिन उपपत्तियों को उनकी कलम ने सरल किया है। उसे पढ़ने भर से संकीर्ण राष्ट्रवाद से बहस करने का डिप्लोमा या प्रमाण पत्र पाठक को प्रभाष जोशी के हस्ताक्षर से हर निबंध में मिलता जाता है। वे एक निष्णात हिन्दू थे-मन वचन और कर्म से। इसलिए निखालिस भारतीय भी। धर्म से ज्यादा संस्कृति प्रभाष जोशी के चिंतन का आयाम रही है। धर्म संस्कृति का ही तो प्रतिफलन है। धर्म निजी विश्वास का विश्वविद्यालय, अनाथालय या संग्रहालय कुछ भी हो। संस्कृति एक सामाजिक समास है। वह श्वास या गंध की तरह मनुष्य और मनुष्येतर जीवन में हवा या नदी की तरह प्रवाहित है। प्रभाष जोशी मनुष्यता का मौसम थे। अपरिचित व्यक्तियों के लिए भी सहज हो अपने स्नेह से नहलाते रहते थे। मुफलिसों के लिए भी प्रभाष जोशी की कलम से ऊष्मा के स्फुलिंग लगातार झरते रहे। उन्होंने समाजवादी होने के बावजूद लेखन में नारेबाजी के शोशे नहीं छोड़े। न ही अकिंचनों के लिए केवल गाल बजाए। समाजवाद और धर्म के सांस्कृतिक पक्ष की जनतांत्रिक पैरवी उन्होंने की है। वैसे उदाहरण हिन्दी पत्रकारिता और वैचारिक लेखन में बहुत देखने को नहीं मिलते।



(संविधान विशेषज्ञ और राजनीतिक चिंतक कनक तिवारी गांधीवादी लेखक माने जाते हैं। स्‍वामी विवेकानंद पर उनकी शोधपरक पुस्‍तक प्रकाशित है। इसके अलावा कई किताबें। छत्‍तीसगढ़ के महाधिवक्‍ता भी रहे। संप्रति रायपुर में रहकर स्‍वतंत्र लेखन।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।